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ब्रज रस माधुरी

PART I · Prayers and aartis · 8/240

प्रार्थना एवं आरती

प्रार्थना · Prayer

25 source linesपुस्तक पृष्ठ 1–2PDF 22–23

दैनिक प्रार्थना

श्री राधाकृष्णाभ्यां नमः

श्री गुरवे नमः श्री गुरवे नमः श्री गुरवे नमः

आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्।

न मर्त्यबुद्ध्याऽसूयेत सर्वदेवमयो गुरुः॥

हे परम प्रियतम पूर्णतम पुरुषोत्तम श्री कृष्ण! तुम से विमुख

होने के कारण अनादिकाल से हमने अनन्तानन्त दुःख पाये एवं

पा रहे हैं। पाप करते करते अन्तःकरण इतना मलिन हो चुका है

कि रसिकों द्वारा यह जानने पर भी कि तुम अपनी भुजाओं को

पसारे अपनी वात्सल्यमयी-दृष्टि से हमारी प्रतीक्षा कर रहे हो,

तुम्हारी शरण में नहीं आ पाता।

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हे अशरण शरण! तुम्हारी कृपा के बिना तुम्हें कोई जान भी तो

नहीं सकता। ऐसी स्थिति में, हे अकारण करु ण! पतितपावन

श्रीकृष्ण! तुम अपनी अहैतुकी कृपा से ही हमको अपना लो।

हे करुणा सागर! हम भुक्ति-मुक्ति आदि कुछ नहीं माँगते, हमें

तो केवल तुम्हारे निष्काम प्रेम की ही एकमात्र चाह है।

हे नाथ! अपने विरद की ओर देखकर इस अधम को निराश न

करो।

हे जीवनधन! अब बहुत हो चुका, अब तो तुम्हारे प्रेम के बिना

यह जीवन मृत्यु से भी अधिक भयानक है। अतएव

प्रेमभिक्षां देहि, प्रेमभिक्षां देहि, प्रेमभिक्षां देहि।

साकेत बिहारी श्री राघवेन्द्र सरकार की जय।

वृन्दावन बिहारी श्री यादवेन्द्र सरकार की जय।

श्रीमद्सद्गुरु सरकार की जय।

जय जय श्रीराधे जय जय श्रीराधे जय जय श्रीराधे।

ब्रज रस माधुरी · भाग १008
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 1. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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