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राघवेन्द्र रघुपति श्री राम,
(भजु मन मेरे...)
राघवेन्द्र रघुपति श्री राम,
शोभित सीता माता बाम।
नयनाभिराम राम पूर्णकाम,
चिदघन आनँदघन तन श्याम।
प्रेम रूप रस अम्बुधि राम,
राम समान दयानिधि राम।
भुक्ति मुक्ति नहिं माँगत राम,
दे दो मोहिं प्रेम निष्काम।
नहिं चहिये बैकुण्ठ ललाम,
हमें एक रामहिं सो काम।
यदपि राम हैं पूर्णकाम,
बिके भक्त कर बिनुहिं दाम।
तुम मेरे हम तेरे राम,
पुनि मोहिं बिसरायेउ कस राम।
नहिं कृपालु कोउ अस जस राम,
गीधहुँ दीन्यों आपुनो धाम।।
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