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1. रूपध्यान करते हुए ही संकीर्तन करो।
2. अत्यन्त दीन भाव उत्पन्न करो।
3. हरि गुरु के अनुकूल ही चिन्तन करो।
4. क्षण क्षण सर्वत्र-सर्वदा हरि स्मरण करो।
5. भाव प्रकट करने का दंभ कभी न करो।
6. मोक्ष-पर्यन्त की कामना कभी न करो।
7. अन्य साधकों में सम्मान की भावना करो।
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