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अब न और तरसावो रसिया,
आओ आओ भोग लगाओ रसिया।
यद्यपि यह सच है नहिं तुम कहँ,
भूख, प्यास लागति रसिया।
तदपि भाव वश ब्रज छछिया लगि,
चोरी करत फिर्यो रसिया।
भाव हीन दुर्योधन व्यंजन,
नहिं टुक मन भायो रसिया।
भाव भरा केले का छिलका,
विदुरानी घर खायो रसिया।
जो रस शबरी के जूठे मुख,
बेर खाय पायो रसिया।
जनकपुरी के राज भोग महँ,
सो रस नहिं पायो रसिया।
Source page 234
हौं मानत हौं भावहीन हौं,
पै सुनु खरी खरी रसिया।
कत “कृपालु” स्तन पियो पूतनहिं
याते अब आ जावो रसिया॥
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