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ब्रज रस माधुरी

PART I · KIRTAN 130 · 154/240

कीर्तन 101–150

कीर्तन 130 · Kirtan 130

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

18 source linesपुस्तक पृष्ठ 233–234PDF 254–255

अब न और तरसावो रसिया,

आओ आओ भोग लगाओ रसिया।

यद्यपि यह सच है नहिं तुम कहँ,

भूख, प्यास लागति रसिया।

तदपि भाव वश ब्रज छछिया लगि,

चोरी करत फिर्यो रसिया।

भाव हीन दुर्योधन व्यंजन,

नहिं टुक मन भायो रसिया।

भाव भरा केले का छिलका,

विदुरानी घर खायो रसिया।

जो रस शबरी के जूठे मुख,

बेर खाय पायो रसिया।

जनकपुरी के राज भोग महँ,

सो रस नहिं पायो रसिया।

Source page 234

हौं मानत हौं भावहीन हौं,

पै सुनु खरी खरी रसिया।

कत “कृपालु” स्तन पियो पूतनहिं

याते अब आ जावो रसिया॥

ब्रज रस माधुरी · भाग १154
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 1. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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