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ठाकुर युगल किशोर हमारो,
चाकर हम पिय प्यारी के।
गुरु सेवा ही धर्म हमारो,
दास न हम श्रुति चारी के।।
चाह इहै, कछु चाह न रह उर,
दास न मुक्ति बिचारी के।
सुखी रहौं सेवत नित सुख महँ,
प्यारी अरु बनवारी के।।
पास न फटकउँ भूलेहुँ कबहुँक,
श्री बैकुंठ बिहारी के।
युगल विहार लखौं निशि वासर,
अनुगत ह्वै ब्रजनारी के।।
करौं टहल बनि महल टहलिनी,
श्री बरसाने वारी के।
होउँ विभोर निपट नटखट को,
दै दै गारी दारी के।।
जिनके अगनित गुन गन गावत,
मति हारी श्रुति चारी के।
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उनके अवगुन गावति गोपिन,
पुनि पुनि चोरी जारी के।।
महाकालहूँ काँपत थर-थर,
डर ते जिन गिरिधारी के।
सोइ काँपत थर-थर साँटी ते,
ब्रज यशुदा सी नारी के।।
शिव सनकादि समाधि साधि चह,
दर्शन जिन बनवारी के।
पूर्णकाम कामी बनि बिहरत,
सँग इक कुबरी नारी के।।
नहिं मान्यो अपराध पूतनहिं,
गरल पिवावन वारी के।
दै “कृपालु” निज लोक मातु सम,
को पटतर बनवारी के।।
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