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ब्रज रस माधुरी

PART I · KIRTAN 93 · 117/240

कीर्तन 51–100

कीर्तन 93 · Kirtan 93

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

32 source linesपुस्तक पृष्ठ 171–172PDF 192–193

ठाकुर युगल किशोर हमारो,

चाकर हम पिय प्यारी के।

गुरु सेवा ही धर्म हमारो,

दास न हम श्रुति चारी के।।

चाह इहै, कछु चाह न रह उर,

दास न मुक्ति बिचारी के।

सुखी रहौं सेवत नित सुख महँ,

प्यारी अरु बनवारी के।।

पास न फटकउँ भूलेहुँ कबहुँक,

श्री बैकुंठ बिहारी के।

युगल विहार लखौं निशि वासर,

अनुगत ह्वै ब्रजनारी के।।

करौं टहल बनि महल टहलिनी,

श्री बरसाने वारी के।

होउँ विभोर निपट नटखट को,

दै दै गारी दारी के।।

जिनके अगनित गुन गन गावत,

मति हारी श्रुति चारी के।

Source page 172

उनके अवगुन गावति गोपिन,

पुनि पुनि चोरी जारी के।।

महाकालहूँ काँपत थर-थर,

डर ते जिन गिरिधारी के।

सोइ काँपत थर-थर साँटी ते,

ब्रज यशुदा सी नारी के।।

शिव सनकादि समाधि साधि चह,

दर्शन जिन बनवारी के।

पूर्णकाम कामी बनि बिहरत,

सँग इक कुबरी नारी के।।

नहिं मान्यो अपराध पूतनहिं,

गरल पिवावन वारी के।

दै “कृपालु” निज लोक मातु सम,

को पटतर बनवारी के।।

ब्रज रस माधुरी · भाग १117
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 1. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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