Skip to main content

ओ माँ श्यामा तेरी जो चरण शरण आये,
माया की कौन कहे मायापति घबराये।
वनचरिन आचरन को श्रुति निंदित बतराये,
सहचरि करि उन सबको, निज भुज भरि उर लाये।
तव पद रज पावन को पद्माहूूँ ललचाये,
ब्रज लता विटप बननो ब्रह्माहूँ मन भाये।
तेरी अनुकम्पा ते शिव गोपी बनि आये,
सनकादि ब्रह्मज्ञानी तन लतन पतन पाये।
Source page 101
चाहत “कृपालु” मेरी तेरी ही कहलाये,
भूले भटके कबहूँ तव सेवा मिल जाये॥
❦
Source, meanings & reading links