कीर्तन 51–100
कीर्तन 100 · Kirtan 100
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
हरे राम (महाराज जी)
Source page 187
तुम पतितन को रखवार, हम पतितन को सरदार।
तुम दीनबंधु सरकार, हम अहंकार अवतार।
तुम करुणा को भंडार, हम याचक याचत प्यार।
तुम ही मम नातेदार, हौं अब न चहौं संसार।
तुम देत पदारथ चार, हम चहत प्रेम उपहार।
तुम कृपा करहु इक बार, हम दउँ तोहिँ प्राणहुँ वार।
तुम जाको चह सरकार, बस सोइ सुहागिनि नार।
तुम त्रिभुवन मोहनहार, मोहूँ मोहहु सरकार।
तुम साँचो मीत हमार, बरबस अपना लो यार।
तुम तनु कुबरी को यार, हम परम कुटिल मन धार।
तुम देत अकारन प्यार, हम येहि आशा तनु धार।
तुम मातु अनादि हमार, हम शिशु पिवाय रसधार।
तुम कहँ प्रिय करुण पुकार, हम अति कर्कश मन धार।
तुम ही अवलंब हमार, हम निरवलंब सरकार।
तुम कर नित पर उपकार, हम मानत नहिँ आभार।
तुम दोउ एकहिं अवतार, निज जन हित द्वै तनु धार।
