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ब्रज रस माधुरी

PART I · Practice and instructions · 23/240

साधना एवं निर्देश

मार्गदर्शन · Guidance

28 source linesपुस्तक पृष्ठ 25–26PDF 46–47

साधना

श्री राधाकृष्ण का रूपध्यान करते हुये, उनके दिव्य प्रेम एवं

दिव्य दर्शन की लालसा से रोकर, उनका नाम-गुण-लीलादि

संकीर्तन करना है। रूपध्यान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। रूपध्यान

मन से बनाना सर्वश्रेष्ठ है। फिर भी स्वेच्छानुसार मूर्ति अथवा

चित्रादि का अवलंब लिया जा सकता है। उस रूप में दिव्य

भावना रखनी है, क्योंकि उनका देह चिदानंदमय दिव्य है।

रूपध्यान, नवजात शिशु से लेकर 16 वर्ष की आयु तक का

करना है। उस रूप का शंृगार आदि स्वेच्छापूर्वक नित्य नया नया

करते रहना है।

रूपध्यान के साथ-साथ, उनकी अनेक मनभायी लीलाओं का

भी ध्यान करना है। तथा उनके दीनबंधुत्व, पतितपावनत्वादि

गुण भी सोचना है।

श्री कृष्ण, उनके नाम, उनके गुण, उनकी लीला, उनके धाम,

उनके संतजनों में पूर्ण अभेद मानना है। ये सब श्री कृष्ण ही हैं।

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मोक्षपर्यन्त की कामना एवं अपने सुख की कामना का पूर्ण त्याग

करना है।

इष्टदेव एवं गुरु को सदा सर्वत्र अपने साथ निरीक्षक एवं संरक्षक

के रूप में मानना है। कभी भी स्वयं को अकेला नहीं मानना है।

खाली समय में यत्र तत्र सर्वत्र श्वास से “राधेश्याम, नाम का जप

करते रहना है।

परदोष-दर्शन, परनिन्दा (भले ही वह निन्दनीय हो), लोकरंजन,

निराशा, आलस्य, विषयीजनों का संग आदि कुसंग से बचना है।

श्री कृष्ण, उनके नाम, गुण, धाम एवं भक्तों के प्रति अक्षम्य

नामापराध से बचना है।

“वे ही मेरे सर्वस्व हैं, यही भावना दृढ़ करना है।

निवेदकः

कृपालु

ब्रज रस माधुरी · भाग १023
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 1. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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