साधना एवं निर्देश
मार्गदर्शन · Guidance
साधना
श्री राधाकृष्ण का रूपध्यान करते हुये, उनके दिव्य प्रेम एवं
दिव्य दर्शन की लालसा से रोकर, उनका नाम-गुण-लीलादि
संकीर्तन करना है। रूपध्यान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। रूपध्यान
मन से बनाना सर्वश्रेष्ठ है। फिर भी स्वेच्छानुसार मूर्ति अथवा
रूपध्यान, नवजात शिशु से लेकर 16 वर्ष की आयु तक का
रूपध्यान के साथ-साथ, उनकी अनेक मनभायी लीलाओं का
श्री कृष्ण, उनके नाम, उनके गुण, उनकी लीला, उनके धाम,
उनके संतजनों में पूर्ण अभेद मानना है। ये सब श्री कृष्ण ही हैं।
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इष्टदेव एवं गुरु को सदा सर्वत्र अपने साथ निरीक्षक एवं संरक्षक
खाली समय में यत्र तत्र सर्वत्र श्वास से “राधेश्याम, नाम का जप
