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ब्रज रस माधुरी

PART I · KIRTAN 97 · 121/240

कीर्तन 51–100

कीर्तन 97 · Kirtan 97

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

24 source linesपुस्तक पृष्ठ 177–178PDF 198–199

नित सेवा माँगूँ श्यामा श्याम तेरी,

न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥

बाढ़ै भक्ति निष्काम नित मेरी,

न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥

तोहिँ पतित जनन ही प्यारे हैं,

हम अगनित पापन वारे हैं।

पुनि कत कर एतिक बेरी,

न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥

Source page 178

यदि कह उन लइ शरणाई रे,

कहु कत पूतना गति पाई रे।

अब बेर न करु करु चेरी,

न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥

ये भली है बुरी है जो है तेरी है,

तुम भी सोचो सचमुच यह मेरी है।

सोचत ही बनि जाय मेरी,

न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥

तेरी इच्छा में इच्छा बनाती रहूँ,

तेरे सुख में ही सुख नित पाती रहूँ।

बस चाह इहै इक मेरी,

न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥

बिनु हेतु कृपालु कहाते हो,

पुनि क्यों साधन करवाते हो।

सुनु विनय “कृपालु” जु मेरी,

न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥

ब्रज रस माधुरी · भाग १121
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 1. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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