नित सेवा माँगूँ श्यामा श्याम तेरी,
न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥
बाढ़ै भक्ति निष्काम नित मेरी,
न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥
तोहिँ पतित जनन ही प्यारे हैं,
हम अगनित पापन वारे हैं।
पुनि कत कर एतिक बेरी,
न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥
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यदि कह उन लइ शरणाई रे,
कहु कत पूतना गति पाई रे।
अब बेर न करु करु चेरी,
न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥
ये भली है बुरी है जो है तेरी है,
तुम भी सोचो सचमुच यह मेरी है।
सोचत ही बनि जाय मेरी,
न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥
तेरी इच्छा में इच्छा बनाती रहूँ,
तेरे सुख में ही सुख नित पाती रहूँ।
बस चाह इहै इक मेरी,
न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥
बिनु हेतु कृपालु कहाते हो,
पुनि क्यों साधन करवाते हो।
सुनु विनय “कृपालु” जु मेरी,
न भुक्ती नाहीं मुक्ती माँगूँ मैं॥