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ब्रज रस माधुरी

PART I · KIRTAN 14 · 38/240

कीर्तन 1–50

कीर्तन 14 · Kirtan 14

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

22 source linesपुस्तक पृष्ठ 43–44PDF 64–65

नहिं बिसरत सखि छैल बिहारी।

(ओ रसिया कस...)

नहिं बिसरत सखि छैल बिहारी।

जित देखूँ तित वोही वोही दीखत,

हाय! ये कैसी मोहिनि डारी।

मोर मुकुट सिर पेच रतन को,

हलकैं मुख अलकें घुँघुरारी।

Source page 44

चंचल नैन मैन मद गंजन,

तामें अंजन रेखु सँवारी।

कुंडल लोल हलनि श्रवनन में,

अधर धरि मुरली धुनि प्यारी।

नाक बुलाक भृकुटि वर बाँकी,

गोल कपोलनि की छवि प्यारी।

उर विशाल वनमाल बिराजत,

गुंजमाल मोतिन माला री।

मणिमय वलय युगल कर सोहे,

कटि किंकिनि पीताम्बर धारी।

गरल सुधा मदमइ दृग चितवनि,

करत फिरत जादू टोना री।

बजत चरन छूम छननन नूपुर,

ताहू पर मुसकावति भारी।

अब “कृपालु” मम लगत न पलकें,

देखि अनूपम रूप बिहारी।

ब्रज रस माधुरी · भाग १038
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 1. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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