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नहिं बिसरत सखि छैल बिहारी।
(ओ रसिया कस...)
नहिं बिसरत सखि छैल बिहारी।
जित देखूँ तित वोही वोही दीखत,
हाय! ये कैसी मोहिनि डारी।
मोर मुकुट सिर पेच रतन को,
हलकैं मुख अलकें घुँघुरारी।
Source page 44
चंचल नैन मैन मद गंजन,
तामें अंजन रेखु सँवारी।
कुंडल लोल हलनि श्रवनन में,
अधर धरि मुरली धुनि प्यारी।
नाक बुलाक भृकुटि वर बाँकी,
गोल कपोलनि की छवि प्यारी।
उर विशाल वनमाल बिराजत,
गुंजमाल मोतिन माला री।
मणिमय वलय युगल कर सोहे,
कटि किंकिनि पीताम्बर धारी।
गरल सुधा मदमइ दृग चितवनि,
करत फिरत जादू टोना री।
बजत चरन छूम छननन नूपुर,
ताहू पर मुसकावति भारी।
अब “कृपालु” मम लगत न पलकें,
देखि अनूपम रूप बिहारी।
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