कीर्तन 201–216
कीर्तन 214 · Kirtan 214
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
सरकार माफ हो गुस्ताख़ी, कुछ खोटी खरी सुनाता हूँ,
मैं तेरा हूँ तेरा होकर, दर दर की ठोकर खाता हूँ।
तू समरथ वारिस है फिर भी, लावारिस मैं कहलाता हूँ,
तू व्यापक हर जर्रे़ में है पर, दीदार न तेरा पाता हूँ।
है करम तेरा मुझ पर बेहद, यह भी अनुमान लगाता हूँ,
पर इस चंचल मन पर रहवर, अधिकार नहीं कर पाता हूँ।
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