Skip to main content

प्रत्येक व्यक्ति , पूर्णतम पुरु षोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण का नित्यदास है।
अतः श्रीकृष्ण सुखैक तात्पर्यमयी सेवा ही प्रत्येक प्राणी का
एकमात्र लक्ष्य है।
वह नित्य निष्काम सेवा, श्री कृष्ण के दिव्य-प्रेम प्राप्त होने पर
ही मिलेगी। वह दिव्य-प्रेम, किसी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ रसिक गुरु
की कृपा से ही मिलेगा। वह रसिक गुरु कृपा, अंतःकरण की
शुद्धि हो जाने पर ही प्राप्त होगी।
वह अन्तःकरण शुद्धि, गुरु निर्दिष्ट साधना भक्ति से ही होगी।
अतएव गुरु -शरणागति में, गुरु निर्दिष्ट साधना द्वारा अंतःकरण
पात्र शुद्ध करना सर्वप्रथम परमावश्यक है।
❦
Source, meanings & reading links