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ब्रज रस माधुरी

PART I · KIRTAN 138 · 162/240

कीर्तन 101–150

कीर्तन 138 · Kirtan 138

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

23 source linesपुस्तक पृष्ठ 238–239PDF 259–260

भजु गौरांग भजु गौरांग, भजु गौरांगेर नाम रे।

एइ गौरांग भजने वारे, जायँ हरि के धाम रे।

एइ गौरांग नदिया वारे, ब्रज के राधे श्याम रे।

एइ गौरांग नदिया वारे, अवध के सीता राम रे।

भीतर श्याम गौर बाहर ते, युगल रूप अभिराम रे।

श्यामा श्याम रूप होकर भी, टेरत श्यामा श्याम रे।

जगाई मधाई सम पतितन को, दीन्यो आपुन धाम रे।

Source page 239

ऐइ गौरांग निज जनहूँ को, पुनि पुनि करत प्रणाम रे।

धनि गौरांग धनि उन परिजन, धनि धनि नदिया ग्राम रे।

कलिमल ग्रसित पतित सरताजहुँ, दिये प्रेम निष्काम रे।

“हरि बोल हरि बोल” बोल बोल के, किय विभोर बिनु दाम रे।

बिनु ही शस्त्र उठाये असुरन, दीन्यो आपुन धाम रे।

हिंसक सिंह व्याघ्रहूँ नाच्यो, सुनि इन मुख हरि नाम रे।

अपने दासहुँ के पद गहि कह, देहु प्रेम निष्काम रे।

एइ अवतार असुर वध नहिं किये, दिये प्रेम निष्काम रे।

एइ गौरांग रो रो कर कह, देहु भीख हरि नाम रे।

एइ गौरांग सब सों यह कह, भेद न नामी नाम रे।

एइ गौरांग बतायो कलि महँ, केवल हरि को नाम रे।

कह गौरांग नाम अपराधी, पाव न फल हरि नाम रे।

माया है नर्तकी भगा दे, उल्टा करि हरि नाम रे।

एइ गौरांग रोम रोम ते, निकसत हरि को नाम रे।

एइ गौरांग कह्यो नामी को, नित्य वास रह नाम रे।

भजु “कृपालु” मन युगल एक तनु, छिन छिन आठों याम रे।

ब्रज रस माधुरी · भाग १162
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 1. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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