कीर्तन 101–150
कीर्तन 138 · Kirtan 138
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भजु गौरांग भजु गौरांग, भजु गौरांगेर नाम रे।
एइ गौरांग भजने वारे, जायँ हरि के धाम रे।
एइ गौरांग नदिया वारे, ब्रज के राधे श्याम रे।
एइ गौरांग नदिया वारे, अवध के सीता राम रे।
भीतर श्याम गौर बाहर ते, युगल रूप अभिराम रे।
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ऐइ गौरांग निज जनहूँ को, पुनि पुनि करत प्रणाम रे।
धनि गौरांग धनि उन परिजन, धनि धनि नदिया ग्राम रे।
कलिमल ग्रसित पतित सरताजहुँ, दिये प्रेम निष्काम रे।
“हरि बोल हरि बोल” बोल बोल के, किय विभोर बिनु दाम रे।
बिनु ही शस्त्र उठाये असुरन, दीन्यो आपुन धाम रे।
हिंसक सिंह व्याघ्रहूँ नाच्यो, सुनि इन मुख हरि नाम रे।
अपने दासहुँ के पद गहि कह, देहु प्रेम निष्काम रे।
एइ अवतार असुर वध नहिं किये, दिये प्रेम निष्काम रे।
एइ गौरांग रो रो कर कह, देहु भीख हरि नाम रे।
एइ गौरांग सब सों यह कह, भेद न नामी नाम रे।
एइ गौरांग बतायो कलि महँ, केवल हरि को नाम रे।
कह गौरांग नाम अपराधी, पाव न फल हरि नाम रे।
माया है नर्तकी भगा दे, उल्टा करि हरि नाम रे।
एइ गौरांग रोम रोम ते, निकसत हरि को नाम रे।
