कीर्तन 51–100
कीर्तन 58 · Kirtan 58
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
बलिहारी वृषभानुदुलारी, जाकर चाकर बनवारी।
बलिहारी वृषभानुदुलारी, जाकर चाकर बनवारी।
विधि हरि हर आराध्य मुरारी, तिनहूँ आराध्या सुकुमारी।
भूलि जात प्यारी चितवनि लखि, हरि निज भगवत्ता सारी।।
लखि वृषभानु किशोरी गोरी, लाजत हरि लखि निज तनु को री।
Source page 126
त्रिभुवन मोहन कुंज बिहारी, तिन मन मोहिनि नथवारी।।
अगनित रूप धरे नँदनंदन, पार न पायो अस प्यारी।
पाव रास रस तबहिँ बिहारी, कृपा करति जब सुकुमारी।।
पिय उर लखि प्रतिबिंब आपुनो, मान करति भोरी भारी।
रिझवत निज स्वामिनि श्यामा को, बनि लिलिहारी मनिहारी।।
मुकुट उतारि धरत पग गिरिधर, धनि धनि बरसाने वारी।
सेवा करन हेतु श्यामा की, नारी बनि गये मदनारी।।
सखिन परत पग, झरत दृगन पिय, मान करति जब जब प्यारी।
पावत नाहिं प्रवेश महल महँ, सखिन करति पहरेदारी।।
लखत बनत वा झाँकी पिय की, जनु मूरति पत्थर वारी।
श्यामा श्याम श्याम हैं श्यामा, भेद मान जड़ संसारी।।
देही देह भेद नहिँ दोउन, मरम जान कोउ अधिकारी।
गौर श्याम सौंदर्य मधुरिमा, पियति समर्था रति वारी।।
दुहुँन मधुरिमा दुहुँन मधुरतर, नित पिय नव नव रस वारी।
करहु “कृपालु” कृपा हम सब पर, हम मायावश तनुधारी॥
Source page 127
अति सुकुमारी भानुदुलारी, नथबेसर वारी प्यारी।
जापर विधि हरि हर वारी सोउ, बरसाने वारी प्यारी।
जाके रोम रोम ब्रज रस बह, पियत नित्य छकि बनवारी।
