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स्वामिनि श्यामा स्वामी श्याम,
(भजु मन मेरे आठो...)
स्वामिनि श्यामा स्वामी श्याम,
विहरत नित वृन्दावन धाम।
रास करत दोउ पूरन काम,
ब्रजरस बरसावत वसुयाम।
इक शृंगार एक छविधाम,
लेहु अमोल मोल बिनु दाम।
युगल ध्यान धरि गाइय नाम,
क्रंदन सुनत लेत कर थाम।
तजहु कामना पकरहु पाम,
माँगहु एक प्रेम निष्काम।
ब्रज रस पाव न कमला बाम,
वा रस दे वनचरि अविराम।
हरि गुरु सेवा ही रह काम,
करु बैकुंठहुँ को जय राम।
विहरत सँग लै जिन ब्रजबाम,
वे सखि हरि प्रतिबिम्ब ललाम।
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इक ते इक बढ़ि दोउ छवि धाम,
प्रेमवश्य नहिं दाम छदाम।
युगल शरण गहु लहु विश्राम,
चहु सेवा अरु रहु ब्रजधाम।
ब्रजरस मिलत सदा बिनु दाम,
शरण“कृपालु”जाहु ब्रजभाम॥
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