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जेंवत मम सद्गुरु सरकार,
गावो मिलि साधक जन जेंवनार।
छप्पन व्यंजन मन नहिं भावत,
साग-पात जेंवत बलिहार।
लखत विविध पकवान मिठाइन,
आँखि दिखावत दें फटकार।
खात खात लघु बालक जनु पुनि,
मटकत बहु विधि जनहिँ निहार।
कबहुँक भोजन करत सभ्य बनि,
कबहुँक जनु शिशु सम व्यवहार।
कबहुँक दृगन मूँदि आरोगत,
जनु कर कछु गम्भीर विचार।
Source page 235
कबहुँक हँसत हँसावत कबहुँक,
कबहुँ बिरावत दाँत निकार।
कबहुँक खात गिरावत कबहुँक,
निज पट कबहुँक आपुन थार।
कबहुँक खात करत हठ जब कोउ,
खात जात नहिं मानत हार।
लखत “कृपालु” भक्त जन कहि कहि,
जय हो जय सद्गुरु सरकार।
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