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ब्रज रस माधुरी

PART I · KIRTAN 157 · 181/240

कीर्तन 151–200

कीर्तन 157 · Kirtan 157

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

27 source linesपुस्तक पृष्ठ 253–254PDF 274–275

राम राघव, राम राघव, राम राघव पाहिमाम्।

राम राघव, राम राघव, राम राघव पाहिमाम्।

भरत लक्ष्मण शत्रुहन ये रूप तुम्हरो राघव।

दाहिका सम शक्ति सीता अग्नि सम तुम राघव।

तुम ही माता, तुम पिता हो, तुम ही सर्वस राघव।

तुम हो स्वामी तुम सखा हो, तुम हो मम सुत राघव।

आत्मा को देह माना, भूल यह की राघव।

बुद्धि जाने मन न माने तुम ही मेरे राघव।

शरण में बाधक है माया वाय बरजहु राघव।

तुम न भूलो मोहिं हौं नहिं तोहिँ भूलूँ राघव।

भुक्ति नहिं चह, मुक्ति नहिं चह, प्रेम चह तव राघव।

तुम अगोचर निज कृपा ते, होवो गोचर राघव।

Source page 254

टुक दिखा दो बाँकी झाँकी धनुषधारी राघव।

चारों भाई जानकी माँ संग आओ राघव।

जो न देना चहहु दर्शन आके कह दो राघव।

गीध को भी उर लगाया कौन तुम सम राघव।

तुम ने तारा बानरहुँ कहँ हौं तो नर हौं राघव।

प्रेमवश शबरी के जूठे बेर खाये राघव।

शिला पर भी की कृपा अस को कृपालु राघव।

एक दिन करिहौ कृपा यह है भरोसा राघव।

देर है अंधेर नहिं है द्वार तुम्हरे राघव।

या कृपा करु या चला दो बाण निज कर राघव।

जी लिया हौं बहुत तुम बिनु अब न जीऊँ राघव।

अब न छोड़ूँ तोरा पाछा हौं हठी सुत राघव।

हौं पतित तुम पतित पावन, करहु पावन राघव।

कर कृपा तुम बिनुहि कारण बेर क्यों पुनि राघव।

तुम हो राम “कृपालु”पुनि क्यों कृपा नहिं कर राघव।

ब्रज रस माधुरी · भाग १181
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 1. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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