कीर्तन 151–200
कीर्तन 157 · Kirtan 157
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
राम राघव, राम राघव, राम राघव पाहिमाम्।
राम राघव, राम राघव, राम राघव पाहिमाम्।
भरत लक्ष्मण शत्रुहन ये रूप तुम्हरो राघव।
दाहिका सम शक्ति सीता अग्नि सम तुम राघव।
तुम ही माता, तुम पिता हो, तुम ही सर्वस राघव।
तुम हो स्वामी तुम सखा हो, तुम हो मम सुत राघव।
आत्मा को देह माना, भूल यह की राघव।
बुद्धि जाने मन न माने तुम ही मेरे राघव।
शरण में बाधक है माया वाय बरजहु राघव।
तुम न भूलो मोहिं हौं नहिं तोहिँ भूलूँ राघव।
Source page 254
टुक दिखा दो बाँकी झाँकी धनुषधारी राघव।
चारों भाई जानकी माँ संग आओ राघव।
जो न देना चहहु दर्शन आके कह दो राघव।
गीध को भी उर लगाया कौन तुम सम राघव।
तुम ने तारा बानरहुँ कहँ हौं तो नर हौं राघव।
प्रेमवश शबरी के जूठे बेर खाये राघव।
शिला पर भी की कृपा अस को कृपालु राघव।
एक दिन करिहौ कृपा यह है भरोसा राघव।
देर है अंधेर नहिं है द्वार तुम्हरे राघव।
या कृपा करु या चला दो बाण निज कर राघव।
जी लिया हौं बहुत तुम बिनु अब न जीऊँ राघव।
अब न छोड़ूँ तोरा पाछा हौं हठी सुत राघव।
हौं पतित तुम पतित पावन, करहु पावन राघव।
