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ब्रज रस माधुरी

PART I · KIRTAN 27 · 51/240

कीर्तन 1–50

कीर्तन 27 · Kirtan 27

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

83 source linesपुस्तक पृष्ठ 58–62PDF 79–83

मेरो राधा रमन, मेरो जीवन धन।

गहु चरन शरन, रहु वृन्दावन।

ब्रज रज कन कन, जानिय चिद्घन।

रहु सँग रसिकन, लहु ब्रजरस धन।

उनकेइ जो जन, उनकोइ जा बन।

जीवन जीवन सोइ जीवन धन।

सुमिरहु निशिदिन गावहु गुन गन।

क्षणभंगुर तन मन भज छन छन।

उनके गुन गन गाइय छन छन।

“तू ही मेरा” यह भाव बढ़ै छन छन।

पइहौ नहिं मन, बिनु रोये सजन।

रह मन मोहन, रह मन मोह न।

चलु चंचल मन, ढिंग मन मोहन।

जो दे तन मन धन, सो ले प्रेम रतन।

दे मायिक मन, ले चिन्मय मन।

उन कारो है तन मम कारो है मन।

जाकी जग सों न बन, वाकी बन हरि सन।

Source page 59

जो था राधा रमन भयो कुब्जा रमन।

जीवन जीवन तुम यदुनन्दन।

रख अपनापन रख अपना पन।

तुम आओ जनि मन ले जाओ मम मन।

तू है मनमोहन मोहहु मम मन।

तेरो कारो कारो तन ले लो मेरो कारो मन।

तव तनु चिद्घन, मम मायिक मन।

निरखहु निज अगनित गुनन सजन।

मम अगनित अवगुन गनन न गन।

ले लो प्रानन, दे दो क्रंदन।

दो या ना दो दरशन, दे दो सतत रुदन।

तुम जाओ मेरे बन, तेरी भल मैं न बन।

मोहिं अपनी बना ना बना मेरा पिया बन।

तोहिं का दूँ सजन, मायिक तन मन।

नहिं रह पिय मन, पिय में रह मन।

ले लो पिय मेरो मन, दे दो निज सुमिरन।

दो ब्रज रस धन, ब्रज गोपी जन।

न दो ब्रजरस धन, दे दो लालसा मिलन।

न दो लालसा मिलन, आ के कह दो सजन।

Source page 60

चुप साधोगे सजन, तो “हाँ” मानूँगी मन।

निज करुण अकारण सोचहु पन।

मेरो साँचो सजन, मेरो नँदनन्दन।

वे मेरे सजन मैं उनकी दुल्हन।

मेरो प्रियतम सत चित आनन्दघन।

सोइ प्राण सजीवन ब्रज बनितन।

सोइ स्वामि, सखा, सुत, पति रसिकन।

सोइ सहज सनेही प्रणत जनन।

सोइ हृदय लगावत तन पतितन।

सोइ बन्धु सनातन दीन जनन।

बिकि जात दाम बिनु कर दीनन।

विचरहि ब्रज बीथिन वृन्दावन।

हरे मन बनितन चितवन मुसकन।

तूने मोहे मदनहूँ मन मोह मेरो मन।

तेरा काला काला तन मेरा ले ले काला मन।

मोहिं लागी लगन हरि गुरु चरनन।

लइ चरन शरन ब्रज गोपी जन।

अर्पन इनकोई तन मन धन।

सेवा चह मन नित ब्रज रसिकन।

Source page 61

चह नित्य बुहारन कुंज भवन।

बनुँ सोइ रज कन जहँ धरहु चरन।

बनुँ पीत बसन लिपटो रहुँ तन।

करुँ नित कीर्तन, रहुँ साधना भवन।

मोहिं लागी लगन, दरसन परसन।

दे दो सेवा रतन, मन सेवा रत न।

मेरे लागे नयन, यशुदा के ललन।

नाहिं छूटै लगन, भल चाहे सजन।

वे फेरें नयन, बाढ़ै और लगन।

लरे उनते नयन, रोवे निशिदिन मन।

पिय जाको वरन, सोइ पावे सजन।

मोहिं करि ले बरन, तोहिं पिय हौं बरन।

पिय दृग बानन, लागे मीठी चुभन।

कर मन सुमिरन, झर दृग अँसुवन।

बिनु नँदनंदन नहिं कल पल छन।

मेरो रोम रोम चह पिय परसन।

करु ऐसो यतन, होवे मधुर मिलन।

चह मधुर मिलन, मन नन्दसुवन।

तू “कृपालु” को सजन अपनाओ दुलहन।

Source page 62

(मेरो राधा रमन)

मेरी प्यारी प्यारी भोरी भारी सुकुमारी।

मेरी बरसाने वारी ब्रजरस वारी।

गोरी गोरी भोरी भोरी स्वामिनी मोरी।

चोरी चोरी चितचोरहुँ चित चोरी।

मेरी प्यारी जू की छवि एतिक प्यारी।

लखि चित मुर्छित गिरे बनवारी।

मेरी प्यारी जू की छवि एतिक प्यारी।

लखि निज परछाई मोहे सुकुमारी।

ब्रज रस माधुरी · भाग १051
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 1. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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