कीर्तन 51–100
कीर्तन 67 · Kirtan 67
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मैं तो राधे राधे गाऊँ कालिंदी तट पे,
वो तो भाजो चलो आवे रोतो वंशी वट पे।
वो तो नन्द को तो रोतो धोतो आवे तट पे।
वो तो सोतो भाजे आवै, रोतो वंशीवट पे
मैं तो बावरी ह्वै नाचूँगी कालिंदी तट पे।
मैं तो दृग बाण मारुँ दृग नटखट के।
मैं तो वारी जाऊँ प्यारी जू के नीले पट पे।
प्यारी मुकुट में मोतियन लर लटके।
मेरी प्यारी जू की प्यारी भौहें कैसी मटकें।
मैं तो वारी जाऊँ प्यारी जू के दृग पट पे।
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मेरी प्यारी जू की किंकिनि कटितट पे।
राधे रानी के चरन मेरे मन अटके।
मैं तो राधे की कहाऊँ राधे राधे रट के।
मैं तो प्यारे को चिढ़ाऊँ राधे राधे रट के।
मैं तो वारी जाऊँ पिय प्यारी खटपट पे।
मेरी प्यारी न भुलावें कभु भूले भटके।
मेरी प्यारी पग पियहुँ मुकुट पटके।
मैं तो प्यारी के महल जाऊँ बेखटके।
पिय प्यारी बनि पाछे आये मुँह लटके।
मैं तो प्यारी नहलाऊँ जमुना तट पै।
मैं तो राधे को बिठाऊँ बिच दृग पट के।
मैं तो राधे पग चापूँ पिय मुँह लटके।
मैं तो प्यारी जू को पक्ष लउँ बेखटके।
मैं तो प्यारी जू की जय बोलूँ पनघट पे।
मैं तो अकड़ के जाउँ आगे नटखट के।
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वो तो निलज भजोइ आवे वंशीवट पे।
मेरी प्यारी जू न प्यारे जू के पास फटकें।
प्यारी पग पिय आँसू टप टप टपके।
मैं तो वारी जाउँ रोतो लखि नटखट पे।
प्यारी गौर रंग लखि पिय मुख लटके।
