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ब्रज रस माधुरी

PART I · KIRTAN 11 · 35/240

कीर्तन 1–50

कीर्तन 11 · Kirtan 11

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

14 source linesपुस्तक पृष्ठ 40–41PDF 61–62

जो पिय रुचि महँ रुचि राखे, प्रेमरस सोई चाखे रे।

(नित सेवा माँगूँ...)

जो पिय रुचि महँ रुचि राखे, प्रेमरस सोई चाखे रे।

जेहि कर्म न नेकहुँ भावे रे,

जेहि ज्ञानहुँ नाहिं सुहावे रे,

जो योग दूरि करि राखे, प्रेमरस सोई चाखे रे।

जो स्वर्ग नरक सम जाने रे,

जो मुक्ति पिशाचिनि माने रे,

नहिं ऋद्धि सिद्धि उर राखे, प्रेमरस सोई चाखे रे।

जो मधुर भाव अपनावे रे,

यामें चारिहुँ भाव समावे रे,

जो निज सुख उर नहिं राखे, प्रेमरस सोई चाखे रे।

Source page 41

जेहि हरि हरिजन ही भावे रे,

कहुँ अनत न टुक मन लावे रे,

जो उर “कृपालु” हरि राखे, प्रेमरस सोई चाखे रे॥

ब्रज रस माधुरी · भाग १035
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 1. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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