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ब्रज रस माधुरी

PART I · KIRTAN 25 · 49/240

कीर्तन 1–50

कीर्तन 25 · Kirtan 25

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

17 source linesपुस्तक पृष्ठ 55–56PDF 76–77

मेरो राधारमण चितचोर, टुक हेरहु हमरिहुँ ओर।

(लाखों महफिल...)

मेरो राधारमण चितचोर, टुक हेरहु हमरिहुँ ओर।

मेरो जीवन जुगल किशोर, लो मोर चपल चित चोर।

उत कारो रँग तनु तोर, इत कारो रँग मन मोर।

तू ही इक सर्वस मोर, हैं तुम्हरे लाख करोर।

तू ही है सब कुछ मोर, अब छोड़ू न पाछा तोर।

मन मधुर मिलन चह तोर, पुरवहु अभिलाषा मोर।

सेवा अभिलाषा मोर, बैकुण्ठ न माँगूँ तोर।

तू रसिकन को सिरमोर, टुक रस दे हौंहूँ तोर।

यह माया अति बरजोर, बरजो ब्रजराज किशोर।

माना कुपूत हौं तोर, माँ जगहुँ न होति कठोर।

नहिँ कछु साधन बल मोर, चह तोर कृपा की कोर।

Source page 56

कहि दे बारेक तू मोर, कछु घटि न जायगो तोर।

मायिक मन बुधि है मोर, है कृपा साध्य रति तोर।

बिनु हेतु कृपा व्रत तोर, कत सुधि न लेत पुनि मोर।

उत पतितन हित व्रत तोर, इत पतितन को सिरमोर।

जनि लखु “कृपालु” ढिग मोर, पापन को ओर न छोर।

ब्रज रस माधुरी · भाग १049
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 1. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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