जगद्गुरु की आरती
जयति जगद्गुरु गुरुवर की,
गावो मिलि आरती रसिकवर की।
गुरु पद-नख-मणि-चन्द्रिका प्रकाश,
जाके उर बसे ताके मोह तम नाश।
जाके माथ नाथ तव हाथ कर वास,
ताते होय माया मोह सब ही निरास।
पावे गति मति रति राधावर की,
गावो मिलि आरती रसिकवर की॥ 1॥
अरे मन मूढ़! छाँड़ु नारी नर हाथ,
गुरु बिनु ब्रह्म श्यामहूँ न देंगे साथ।
कोमल कृपालु बड़े कृपासिंधु नाथ,
पाके इन्हें आज तू अनाथ हो सनाथ।
इन्हीं के आधीन कृपा गिरिधर की
गावो मिलि आरती रसिकवर की॥ 2॥
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भक्तियोग-रस-अवतार अभिराम,
करें निगमागम समन्वय ललाम।
श्यामा-श्याम नाम, रूप, लीला, गुण, धाम,
बाँटि रहे प्रेम निष्काम बिनु दाम।
हो रही सफल काया नारी नर की,
गावो मिलि आरती रसिकवर की॥ 3॥
लली लाल लीला का सलोना सुविलास,
छाया दिव्य दृष्टि बिच प्रेम का प्रकाश।
वैसा ही विनोद वही मंजु मृदु हास,
करें बस बरबस उच्च अट्टहास।
झूमि चलें चाल वही नटवर की,
गावो मिलि आरती रसिकवर की॥ 4॥