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ब्रज रस माधुरी

PART I · KIRTAN 76 · 100/240

कीर्तन 51–100

कीर्तन 76 · Kirtan 76

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

30 source linesपुस्तक पृष्ठ 145–147PDF 166–168

राधे ठकुरानी राधे महरानी,

राधे रसदानी राधे ब्रजरानी।

वृन्दावन जाकी रजधानी,

जो प्रेम रूप रस की खानी।

Source page 146

जो ऐसी हैं अवढरदानी,

ब्रज बनचरि प्राण सखी मानी।

जाकी याचत सारँगपानी,

करु कृपा कोर राधे रानी।

कहि जयति जयति जय महरानी,

कर पूर्णब्रह्म हरि अगवानी।

मानिनि लखि श्री राधेरानी,

थर-थर काँपत सारँगपानी।

जाकी महिमा नहिं सक जानी,

धरि कोटिन तनु सारँगपानी।

जाको श्यामहुँ स्वामिनि मानी,

धर मुकुट चरण युग महरानी।

जा पद-रज संजीवनि मानी,

चह लतन पतन तनु धरि ज्ञानी।

जाकी दासी कमला, बानी,

चह चरण धूरि राधे रानी।

तप कर कठोर कमलारानी,

दर्शन हित श्री राधेरानी।

Source page 147

जड़ लता पता तत्वज्ञानी,

बोलत राधे राधे बानी।

शुक पिक मयूर जा रजधानी,

लखि मोचत निज अँखियन पानी।

सद्गुरु अनुकम्पा अब जानी,

मम गति मति रति राधेरानी।

श्रुति कह कृपालु सारँगपानी,

पै अति “कृपालु” राधेरानी।

ब्रज रस माधुरी · भाग १100
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 1. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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