Skip to main content

श्री राधाकृष्ण ही तुम्हारे सर्वस्व हैं।
उन्हें बिलकुल ही अपना समझो। यह न
भगवान आदि हैं। वे सदा अपने दोनों हाथों
को पसारे हुये तुम्हारे लिये खड़े हैं। केवल
तुम एक बार समस्त सांसारिक विषयों से
मुख मोड़कर उनकी ओर देख दो। बस,
फिर वे तुम्हारे सब [अस्पष्ट]।
वे तो अकारण करुण हैं, तुम्हारे पापाचारादि
की भी [अस्पष्ट] नहीं रखते। उनका तो
स्वभाव ही है अकारण कृपा करने का।
तुम विश्वास कर लो, बस, [अस्पष्ट]
तुम अपने आप को सर्व संबंधों [अस्पष्ट]
हाथों बेच दो, वे सब ठीक कर लेंगे।
हस्तलिखित पृष्ठ का आंशिक, अप्रमाणित पाठ। जिन शब्दों का स्पष्ट पठन सम्भव नहीं हुआ, वे [अस्पष्ट] से चिह्नित हैं। पूरा मूल पृष्ठ नीचे है।
❦
Source, meanings & reading links