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प्राण प्रियतम, प्राणधन मम, प्राणवल्लभ पाहि माम्।
दृगन अंजन, गोपिका जन, राधिकाधन रक्ष माम्॥
गोपिकाजन नयन अंजन, रसिक रंजन रक्ष माम्।
भक्तवत्सल नाम सुनि तव, हृदय काँपत मेरे श्याम।
पतितपावन नाम सुनि पुनि, होत साहस बनइ काम।
पूतना कब शरण आई, दिये “कृपालु” जु दिव्य धाम॥
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