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ब्रज रस माधुरी

PART I · KIRTAN 28 · 52/240

कीर्तन 1–50

कीर्तन 28 · Kirtan 28

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

21 source linesपुस्तक पृष्ठ 62–63PDF 83–84

रसिकन को सिरमोर मोर पिय !

(श्री गुरुदेव...)

रसिकन को सिरमोर मोर पिय !

प्यारी मुख चन्द्र चकोर मोर पिय !

करहु कृपा की कोर मोर पिय !

तुम ही गति मति मोर मोर पिय !

Source page 63

प्रणत भगत चित चोर मोर पिय !

अब तो सुधि लो मोर मोर पिय !

देखहु हमरिहुँ ओर मोर पिय !

हँसी मोर नहिं तोर मोर पिय !

तव माया बरजोर मोर पिय !

कछु न कामना मोर मोर पिय !

सेवा माँगत तोर मोर पिय !

दो ब्रज रस महँ बोर मोर पिय !

छोड़ूँ न पाछा तोर मोर पिय !

तुम बिनु नहिं कोउ मोर मोर पिय !

लजवत काम करोर मोर पिय !

अपनेहुँ चित को चोर मोर पिय !

घटि न जाय कछु तोर मोर पिय !

लाज जाएगी तोर मोर पिय !

कब ते भयहु कठोर मोर पिय !

लखहु “कृपालुहुँ” ओर मोर पिय !

ब्रज रस माधुरी · भाग १052
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 1. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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