कीर्तन 101–134
कीर्तन 130 · Kirtan 130
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लरे भोरी भारी कुँवरि माय बिरुझाय।
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कह कुँवरि प्रथम हाँ करि तुतुराय।
अच्छा कहु हाँ हाँ हाँ हाँ कह माय।
तू तो लाली अभी पाँच बरस की आय।
जैसे जैसे होगी लाली तू बड़ी कह माय।
वैसे वैसे वेणी आपुहिं बाढ़ति जाय।
लाली कह मोहिँ अबहिं बड़ी करु माय।
ना ना लाली ऐसा जनि कहु कह माय।
यदि लाली तू अबहिं मो सी बड़ी ह्वै जाय।
तेरी वेणी भी अवशि मो सी बड़ी ह्वै जाय।
तब गोदी में खिलाय काको तू हीं बताय।
पुनि वेणी खींचि श्रीदामा भी तोहिं रुलाय।
पुनि सखियन भी तोहिं सँग न खेलाय।
पुनि बाबा भी न गोद ले के तोहिँ खेलाय।
यह सुनि भोरी लाली गइ हिय डरपाय।
Source page 325
बार बार बाबा चूमें मुख उर ते लगाय।
कहूँ ललितादि सखियन सो हूँ हौँ माय।
सब सखि कहु निज निज माय ढिंग जाय।
बड़ी हो के नहिं मिले गोद बाबा अरु माय।
बड़ी हो के गुड्डी गुडरा का खेल छुटि जाय।
बड़ी होने पै तो करि देंगे ब्याहु बाबा माय।
ब्याहु करि घर राखे नहिं देय वा भगाय।
सब ने ही कही आजु हम कहें निज माय।
सखी कह चलो लाली खेल खेलें मनभाय।
ललिता कह लावूँ नँदलाल को बुलाय।
लाली कह नहिं नहिं नहिं वाय न बुलाय।
वो तो हारे तो न दाँव देय भाजे बलभाय।
इतने में आये आपुहिं तहँ बलभाय।
लाला कह लाली मोहूँ निज सँग खिलाय।
लाली कह यदि खेल में तू हारे बलभाय।
दाँव देना परे कान खोलि सुनु बलभाय।
