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आजु कान्ह को नीँद न आय।
(नीको लागे...)
आजु कान्ह को नीँद न आय।
याते कान्ह बुलायो माय।
मो ढिंग बैठो कह बलभाय।
कोउ कहानी माय सुनाय।
कहौं कहानी सुनु कह माय।
हुंकारी भरियो बलभाय।
अवधपुरी में थे इक राय।
दशरथ नाम पुरानन गाय।
दसहूँ दिशि उनको रथ जाय।
उनकी नारी तीन बताय।
इक कौशल्या नाम बताय।
इक कैकेयी नाम बताय।
इक सुमित्रा नाम बताय।
बड़ी नारि कौशल्या आय।
दशरथ पुत्र चार बतलाय।
ज्येष्ठ पुत्र तो राम कहाय।
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उनको श्रुति भगवान बताय।
एक पुत्र लक्ष्मण कहलाय।
एक पुत्र को भरत बताय।
एक शत्रुहन नाम बताय।
राम नारि सीता कहलाय।
सोऊ ब्रह्म रूप बतलाय।
कैकेयी सौतेली माय।
रामहिं दिय तिन विपिन पठाय।
चौदह बरस बसे वन जाय।
सीता राम लखन वन जाय।
बन महँ असुर दशानन आय।
सीता को लै गयो उड़ाय।
मग महँ मिल्यो जटायू आय।
वाको रावण मारि गिराय।
सीता कह हा राम बचाय।
यह सुनि उठि बैठे बलभाय।
कह लक्ष्मण लक्ष्मण धनु लाय।
मानहु क्रोध रूप धरि आय।
दृश्य देखि यह डरि गई माय।
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गूढ़ मरम नहिं समुझी माय।
जाने साधारण सुत माय।
पकरी माय धाय बलभाय।
लै गोदिहिं पुनि पुनि दुलराय।
लिय छुपाय आँचल बलभाय।
नाम जपति नारायण माय।
जान न नारायण बलभाय।
नींद आय बलभाय सुलाय।
राम “कृपालु” माय बलभाय॥
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