ब्रह्म रूप आनँद कहाय।
(नीको लागे...)
ब्रह्म रूप आनँद कहाय।
दोउ शब्द पर्याय बताय।
ब्रह्म शक्ति सब जीव कहाय।
याते जीव अंश कहलाय।
अंश लक्ष्य अंशी बतलाय।
जीव लक्ष्य आनंदहिँ आय।
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ब्रह्म अभिन्न रूप द्वै आय।
निराकार इक ब्रह्म कहाय।
इक साकार ब्रह्म कहलाय।
कृष्ण ब्रह्म साकार कहाय।
उनके रूप अनंत बताय।
वे सब ही अवतार कहाय।
कृष्ण प्राप्ति ही लक्ष्य बताय।
निराकार जो ब्रह्म कहाय।
वह है निर्गुण वेद बताय।
कृपा आदि गुण नहिँ प्रकटाय।
बिनु हरि कृपा न माया जाय।
निर्गुण ब्रह्म न लक्ष्य दिलाय।
कृष्ण प्राप्ति पथ तीन बताय।
कर्म, ज्ञान अरु भक्ति कहाय।
विधि निषेध श्रुति कर्म बताय।
सोइ वर्णाश्रमधर्म कहाय।
कर्म नियम श्रुति छे बतलाय।
नेकहुँ त्रुटि यजमान नसाय।
कलि महँ कर्म अशक्य बताय।
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पुनि कर्महिं फल स्वर्ग बताय।
स्वर्गहुँ माया लोक कहाय।
स्वर्ग लोक सुख अल्प बताय।
दुख परिणामी स्वर्ग कहाय।
तहँ तम युत अज्ञान बताय।
तहाँ काम क्रोधादि सताय।
तृष्णा आदि और बढ़ि जाय।
भोग योनि पुनि स्वर्ग कहाय।
याते सुर चह नर तनु पाय।
कर्म योनि नर योनि कहाय।
कछुक काल कहँ स्वर्गहिं पाय।
पुनि कूकर शूकर तनु पाय।
याते स्वर्ग निंद्य बतलाय।
घोर मूर्ख तेहि वेद बताय।
दूजो मार्ग ज्ञान कहलाय।
अति विरक्त अधिकारी आय।
साधन चार युक्त बनि जाय।
यह पथ औरहुँ क्लिष्ट बताय।
बड़े बड़े ज्ञानी गिरि जाय।
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कलि महँ ज्ञान असंभव आय।
पुनि याते माया नहिं जाय।
जो ज्ञानी भक्तिहिं अपनाय।
सो हरि कृपा मुक्त ह्वै जाय।
किन्तु प्रेम रस सोउ न पाय।
मुक्ति पिशाचिनि रसिक बताय।
केवल भक्ति लक्ष्य बतलाय।
भक्तहिं मुक्ति आपु मिलि जाय।
प्रेमानंद सदा को पाय।
साधन सिद्धि भक्ति कहलाय।
सबै जीव अधिकारी याय।
भक्तिहिं लक्ष्य “कृपालु” बनाय॥