कीर्तन 101–134
कीर्तन 117 · Kirtan 117
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मैंने जाना तोहिं भोरा भारा छोरा छलिया।
मैंने जाना तोहिं भोरा भारा छोरा छलिया।
तू तो निकला लुटेरा सरदार छलिया।
मेरी भूल यह मैंने तोहि देखा छलिया।
देखना भी क्या है बड़ा अपराध छलिया।
देखते ही तूने आँखों को मिलाया छलिया।
पुनि चुपके ते घुसा उर पुर छलिया।
मेरी सारी जमा पूँजी तूने लूटी छलिया।
तूने लूटे मेरे अगनित पाप छलिया।
पाप करने में होता बड़ा श्रम छलिया।
तू क्या जाने तूने किया नहिं पाप छलिया।
तूने लूटे मेरे अगनित पुण्य छलिया।
दिया बाती को भी छोड़ा नहि कछु छलिया।
मेरे पाप पुण्य लूटे सो तो लूटे छलिया।
मेरे हाथ पैर भी तूने काटे छलिया।
Source page 294
मेरे पंचकोश भी तूने लूटे छलिया।
मेरे तीनों देह भी तूने लूटे छलिया।
मेरा कछु भी न छोड़ा तू लुटेरा छलिया।
शुभाशुभ कर्म कर्ता था मन छलिया।
तूने मन को भी छोड़ा नहिं लूटा छलिया।
मन गया निज स्वामिनि ढिंग छलिया।
मन स्वामिनि माया आई देखा छलिया।
भागी लखतहिं तोहिँ लुटेरा छलिया।
माया के थे बड़े बड़े सेनापति छलिया।
काम क्रोध लोभ मोह भट थे छलिया।
माया भागी जब सब भागे द्रुत छलिया।
मेरे साथी थे अनादि ये सब छलिया।
मेरा साथ छोड़ि गये अब सब छलिया।
जग के लुटेरे लूटि भजि जायँ छलिया।
तू तो सब कुछ लूटा बैठा उर छलिया।
तोहिँ काऊ को न डर तू निडर छलिया।
जब सब कछु लूटि लिया तूने छलिया।
Source page 295
तेरा भला हो लुटेरा ले जा सब छलिया।
काउ दिन तोहिँ मिले राधारानी छलिया।
वे भी तेरा सब कुछ लूटेंगी छलिया।
तब लूटने का मजा चखे तू भी छलिया।
ब्रज की हैं महरानी राधा रानी छलिया।
उन्हें पता नहीं होगा तू लुटेरा छलिया।
जाके कहूँ अभी प्यारी जू ते हौं छलिया।
