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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 80 · 88/142

कीर्तन 51–100

कीर्तन 80 · Kirtan 80

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

42 source linesपुस्तक पृष्ठ 199–201PDF 216–218

नंद घर ब्रह्म बन्यो नँदनंद।

(नीको लागे...)

नंद घर ब्रह्म बन्यो नँदनंद।

जेहि आनँद कहत श्रुति छंद।

सोइ आनंद कंद नँदनंद।

जो था रस अस कह श्रुति छंद।

सो बनि गयो रसिक नँदनंद।

जाको कह निर्गुण श्रुति छंद।

सो अगणित गुण युत नँदनंद।

Source page 200

जेहि कह निराकार श्रुति छंद।

प्रकटा नराकार नँदनंद।

जाको व्यापक कह श्रुति छंद।

सोई ब्रह्म बना नँदनंद।

जगत पिता कह जेहि श्रुति छंद।

सोइ बनि आया ब्रज नँदनंद।

जो स्वतंत्र है कह श्रुति छंद।

सोइ अधीन गोपिन नँदनंद।

जाते डर डर कह श्रुति छंद।

सोइ डर साँटिहिं ब्रज नँदनंद।

जो नचाव जग कह श्रुति छंद।

सोइ नाचत तारिन नँदनंद।

जेहि अग्राह्य कहत श्रुति छंद।

ऊखल बँध्यो सोइ नँदनंद।

जाको कह अदृष्ट श्रुति छंद।

सोइ ब्रज बन्यो दृष्ट नँदनंद।

जेहि जग पालक कह श्रुति छंद।

सोइ भूखा रोवत नँदनंद।

जाको अजित कहत श्रुति छंद।

Source page 201

सोइ रणछोर भयो नँदनंद।

जेहि सर्वज्ञ कहत श्रुति छंद।

सोइ पढ़ स्वर व्यंजन नँदनंद।

जो बिनु पग चल कह श्रुति छंद।

सोइ चलनो सीखत नँदनंद।

अंतर्यामी कह श्रुति छंद।

खोजत कुंज ललिहिं नँदनंद।

जेहि कह गुणातीत श्रुति छंद।

सोइ सिरमौर चौर नँदनंद।

आत्माराम कहत श्रुति छंद।

सोइ सिरमोर जार नँदनंद।

जेहि कह भूख रहित श्रुति छंद।

जूठन खाय सखन नँदनंद।

जाको सुखघन कह श्रुति छंद।

रोवत ब्रज “कृपालु” नँदनंद॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २088
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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