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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 11 · 19/142

कीर्तन 1–50

कीर्तन 11 · Kirtan 11

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

48 source linesपुस्तक पृष्ठ 29–32PDF 46–49

ब्रह्मा भृगु संवाद सुनाय।

(नीको लागे...)

ब्रह्मा भृगु संवाद सुनाय।

ब्रह्मा पितु अरु सुत भृगु आय।

Source page 30

पूछ्यो भृगु ब्रह्मा ढिंग जाय।

एक प्रश्न उत्तर समुझाय।

वर माँग्यो तुमने बलभाय।

गोपी पद रज मोहिं दिलाय।

शिव शुक महाभक्त कहलाय।

उन तजि गोपिन पद रज भाय।

ब्रह्मा कह सुनु भृगु मन लाय।

ब्रह्म ज्ञान तुम कहँ भरमाय।

महिमा भक्ति न जानि सकाय।

तप चिरकाल कियो हौं जाय।

तबहुँ न गोपी पद रज पाय।

गोपिन कायव्यूह बलभाय।

ज्ञान स्वरूपा ऋचन बताय।

उनकी स्वामिनि गोपिन आय।

रहीं ऋचन निष्काम सदाय।

गोपी प्रेम सकाम बनाय।

जेहि ज्ञानी खोजत श्रुति जाय।

सोइ आपुहिं गोपिन घर जाय।

वेद स्तुति नहिं वाय सुहाय।

Source page 31

गोपिन गारी अति मनभाय।

जेहि खोजत तुम ध्यान लगाय।

सोइ ब्रज गोपिन खोजत जाय।

जेहि लखि शंभु समाधि लगाय।

सोइ कर गोपिन दास्य सदाय।

वैधी भक्ति न वाय सुहाय।

गोपी अपमानहुँ मनभाय।

जासु नाम भवबंध छुड़ाय।

सोइ यशुमति ऊखल बँधि जाय।

जेहि माया सब जगहिं नचाय।

तेहि गोपिन दै छाछ नचाय।

जो नहिं सनक समाधिहुँ जाय।

तासोँ श्यामा पग पलुटाय।

श्याम स्वामिनी श्यामा आय।

ज्ञानिन मनन काल्पनिक आय।

कारण मन मायिक कहलाय।

भक्तन मनन दिव्य कहलाय।

पराशक्ति मन दिव्य बनाय।

ज्ञानी ब्रह्म कृपा नहिं पाय।

Source page 32

कारण ब्रह्म अगुण कहलाय।

बिना भक्ति माया नहिं जाय।

भक्तिहुँ मिले कृपा बलभाय।

याते लेहु भक्ति अपनाय।

महाभाव जो भक्ति बताय।

सर्वश्रेष्ठ सोइ भक्ति कहाय।

सोइ “कृपालु” रति गोपिन पाय॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २019
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Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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