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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 15 · 23/142

कीर्तन 1–50

कीर्तन 15 · Kirtan 15

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

91 source linesपुस्तक पृष्ठ 41–45PDF 58–62

वेदन तीन तत्व बतलाय।

(नीको लागे...)

वेदन तीन तत्व बतलाय।

ब्रह्म जीव माया कहलाय।

तीनहुँ तत्व अनादि बताय।

ब्रह्म शक्ति श्रुति तीन बताय।

परा स्वरूप शक्ति कहलाय।

अपरा जीव शक्ति बतलाय।

जड़ शक्तिहिं माया कहलाय।

जीव शक्ति चेतन बतलाय।

जीव अर्थ द्वै बुध बतलाय।

जो रह चेतन स्वयं सदाय।

जो तनु को चेतन करवाय।

जीव परा ते पृथक बताय।

जीव पृथक माया ते आय।

याते जीव तटस्थ कहाय।

ब्रह्म कृष्ण रवि सम कहलाय।

सूर्य किरन सम जीव बताय।

Source page 42

मायाधीश ब्रह्म कहलाय।

मायाधीन जीव श्रुति गाय।

ब्रह्म अंश नहिं जीव कहाय।

ब्रह्म अखंड एक कहलाय।

उसका खंड असंभव आय।

माया शक्तिहुँ जड़ बतलाय।

वाको अंशहुँ जीव न आय।

परा अंश भी जीव न आय।

परा शक्ति तो वाय बताय।

जासु ब्रह्म स्रष्टा कहलाय।

जासु नियामक ब्रह्म कहाय।

जासु ब्रह्म व्यापक कहलाय।

यह तीनहुँ गुण जीव न पाय।

ब्रह्म अभिन्न जीव नहिं आय।

मायाधीन जीव बतलाय।

परा जीव रह बिच बलभाय।

जीव परा का गुण नहिं पाय।

कृष्ण अंश भी द्वै बतलाय।

स्वांश विभिन्नांशहिं बुध गाय।

Source page 43

स्वांश कृष्ण अवतार कहाय।

स्वांश नियंता परा बताय।

विभिन्नांश जीवहुँ द्वै आय।

इक तो नित्य मुक्त कहलाय।

इक अनादि मायिक श्रुति गाय।

जीव शक्ति युत कृष्ण कहाय।

वाको अंश जीव बतलाय।

जीव नियामक ब्रह्म बताय।

जीव आयतन अणु श्रुति गाय।

गमनागमन जीव कहँ आय।

उत्क्रांतिहुँ जीव न बतलाय।

याते जीव न विभु कहलाय।

ये वै के च मंत्र बतलाय।

तनु तजि चंद्र लोक सब जाय।

तस्माल्लोकात् मंत्र बताय।

जीव जगत में पुनि पुनि आय।

स यदा अस्मात् मंत्र बताय।

उत्क्रांतिहुँ सब जीव न आय।

कर्महिं शक्ति देय बलभाय।

Source page 44

कर्महिं जीव स्वतंत्र बताय।

फल भोगहिं परतंत्र बताय।

जीव ब्रह्म दोउ चित् श्रुति गाय।

जीव ब्रह्म दोउ नित्य बताय।

याते दोउ अभिन्न कहाय।

विभु चित् ब्रह्म वेद बतलाय।

अणु चित जीव भेद यह आय।

सर्वशक्ति युत ब्रह्म कहाय।

अल्प शक्ति युत जीव कहाय।

ब्रह्म कृष्ण सर्वज्ञ कहाय।

जीव सबहिं अल्पज्ञ बताय।

ब्रह्म नियामक वेद बताय।

जीव नियम्य भेद बतलाय।

मायाधीश ब्रह्म श्रुति गाय।

मायाधीन जीव बतलाय।

कृष्ण दास हैं जीव सदाय।

जीव वास सब हृदय बताय।

जीव व्याप्त पूरे तनु आय।

मुक्ता अपि यह मंत्र बताय।

Source page 45

मुक्त जीव भी अणु श्रुति गाय।

मुक्त जीव धरि तनु जग आय।

तनु धरि कृष्ण भक्ति रस पाय।

शंकर का भी भाष्य बताय।

जीवहिं ज्ञाता वेद बताय।

जीवहिं कर्ता वेद बताय।

जीवहिं भोक्ता वेद बताय।

जीवहिं अणु स्वातंत्र्य बताय।

ज्ञानाश्रय सब जीव कहाय।

जीव ज्ञान गुण युक्त बताय।

जीव अतीत प्रकृति बतलाय।

निर्विकार है जीव सदाय।

अव्यय जीव अनंत बताय।

जीव अदाह्य अशोष्य बताय।

जीव सदा अच्छेद्य बताय।

जीव सदा अक्लेद्य बताय।

जीव “कृपालु” शरण बलभाय॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २023
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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