लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content

ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 9 · 17/142

कीर्तन 1–50

कीर्तन 9 · Kirtan 9

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

91 source linesपुस्तक पृष्ठ 21–26PDF 38–43

तीन ही तत्व श्रुति नित्य बताय।

(नीको लागे...)

तीन ही तत्व श्रुति नित्य बताय।

ब्रह्म अरु जीव, अरु माया कहाय।

तीनों तत्व अनादि बताय।

ब्रह्म शब्द के द्वै अर्थ बताय।

वृहति ब्रह्म इक अर्थ बताय।

Source page 22

सबसे बड़ा जो हो भाव यह आय।

दूजो अर्थ वृंहयति आय।

जो कर बड़ा भाव यह आय।

बड़ा शब्द अर्थ अनंत बताय।

ब्रह्म समान न कोउ श्रुति गाय।

कोउ नहिं बड़ा ब्रह्म ते आय।

याते ब्रह्म अनंत कहाय।

ब्रह्म अनंत शक्ति युत आय।

ब्रह्म सर्ववित वेद बताय।

जीवहिं दे सुख ब्रह्म सदाय।

याते बड़ो करे कहलाय।

श्रुति आनंदो ब्रह्म बताय।

भाव ब्रह्म आनँद पर्याय।

सत चित दोउ विशेषण आय।

सत शाश्वत सत्ता कहलाय।

चित का अर्थ ज्ञान बतलाय।

आनंद चित चेतन कहलाय।

स्व प्रकाश सो ब्रह्म कहाय।

जो सत सो चित, आनँद आय।

Source page 23

जो चित सो सत, आनँद आय।

जो आनँद सो सत चित आय।

शक्ति ब्रह्म सविशेष बनाय।

प्रमुख स्वरूप शक्ति कहलाय।

सोई ब्रह्म साकार बनाय।

मंत्र रसो वै सः श्रुति गाय।

रस स्वरूप है ब्रह्म बतलाय।

सो रस रूपहुँ द्वै बतलाय।

ब्रह्म रूप इक मधु बतलाय।

दूजो रूप भ्रमर बतलाय।

याते ब्रह्म रसिक रस आय।

ब्रह्म गुणहिं माधुर्य बताय।

ब्रह्म गुणहिं ऐश्वर्य बताय।

ब्रह्म गुणहिं सर्वज्ञ बताय।

ब्रह्म गुणहिं इक तेज बताय।

ब्रह्म भक्त वत्सल गुण भाय।

ब्रह्महिं भक्त वश्य गुण आय।

अगणित गुण गण ब्रह्म बताय।

ब्रह्म अभिन्न त्रिरूप बताय।

Source page 24

एक रूप तो ब्रह्म कहाय।

एक रूप परमात्मा भाय।

एक रूप भगवान कहाय।

ब्रह्म स्वरूप पूर्ण श्रुति गाय।

ब्रह्म शक्ति युत वेद बताय।

शक्ति विकास न्यूनतम आय।

ब्रह्म सच्चिदानंद बताय।

ब्रह्म सर्वव्यापक बतलाय।

निराकार है ब्रह्म बताय।

दूजो परमात्मा कहलाय।

यामें अधिक शक्ति प्रकटाय।

यह सविशेष ब्रह्म कहलाय।

यामें लीला नाहिं बताय।

प्रमुख रूप भगवान कहाय।

यामें सर्व शक्ति प्रकटाय।

यामें लीला परिकर भाय।

यह भगवान कृष्ण कहलाय।

यही प्रतिष्ठा ब्रह्महुँ आय।

यही ब्रह्म योनिहुँ कहलाय।

Source page 25

एक रूप बहु रूप बनाय।

यदपि कृष्ण साकार सुहाय।

तदपि सर्वव्यापक भी आय।

अग जग सब जग आत्मा आय।

कृष्ण दिव्य गुण युक्त बताय।

याते कृष्ण सगुण कहलाय।

कृष्ण प्रकृति गुण रहित बताय।

याते निर्गुण कृष्ण कहाय।

कृष्ण स्वयं भगवान कहाय।

अद्वय ज्ञान तत्व सोइ आय।

कृष्ण आदि कारण कहलाय।

कृष्णहिं आश्रय तत्व कहाय।

कृष्ण नराकृति ब्रह्म बताय।

लीलाधारी कृष्ण कहाय।

कृष्ण धाम गोलोक कहाय।

जन मन मोहन कृष्ण कहाय।

निज मन मोहन कृष्ण कहाय।

कृष्ण दयामय वेद बताय।

कृष्ण भक्त वश शास्त्र बताय।

Source page 26

ब्रह्म कृष्ण द्वै रूप बनाय।

एक राधा एक कृष्ण कहाय।

कृष्ण सेव्य राधा कहलाय।

राधा सेव्य कृष्ण कहलाय।

ब्रह्म द्वारिका पूर्ण कहाय।

मथुरा ब्रह्म पूर्णतर भाय।

ब्रज के ब्रह्म पूर्णतम आय।

ब्रज रस सर्वश्रेष्ठ रस आय।

मोहूँ लो “कृपालु” अपनाय॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २017
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

Related official book listing · Official full collection · Official author website · Read as text