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पिया बिनु मोरा जिया हाय घबराय।
(नथवारी रंगीली...)
पिया बिनु मोरा जिया हाय घबराय।
कहाँ जावूँ कासोँ कहूँ कहा कहूँ हाय।
दृग माँगे पुनि दरसन बलभाय।
श्रुति माँगे मृदु बोलनि बलभाय।
नासा माँगे दिव्य तनु गंध बलभाय।
रसना चह अधरामृत वाय।
तनु चह आलिंगन बलभाय।
मन कर चिंतन छवि बलभाय।
बुधि कह मम सब कुछ बलभाय।
जब ते लखि सखि छवि बलभाय।
घर आँगन कछु नाहिँ सुहाय।
जित देखूँ दीखे बलभाय।
दिन पल छिन कहुँ चैन न आय।
तारे गिन गिन रैन बिताय।
पुनि पुनि उठति हूक हिय हाय।
खान पान शृंगार न भाय।
Source page 274
खारा लग सारा जग हाय।
कहँ लौं जारहिं प्रेम छुपाय।
कहतहुँ बनत न होय हँसाय।
वाने अस दृग बान चलाय।
दीनो तन मन प्रान गमाय।
पर उर पीर मधुर मनभाय।
याते याको तजि न सकाय।
मन कह यह रह पीर सदाय।
बुधि कह भूलि जाहु बलभाय।
इमि मन बुधि दोउ लरत सदाय।
हौं हारी मन बुधि समुझाय।
तू ही सखि इन कहँ समुझाय।
सखि कह हौं लावूँ बलभाय।
सोई यह उरझनि सुरझाय।
इतने में आये बलभाय।
लखि मन बुधि निज सुधि बिसराय।
जब आई सुधि नहिं बलभाय।
सखि कह प्रेम रोग नहिं जाय।
याको वैद्य असाध्य बताय।
Source page 275
याके वश रह नित बलभाय।
यह तो मुक्त जनहुँ नहिं पाय।
धनि “कृपालु” तू प्रेमहिं पाय॥
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