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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 129 · 137/142

कीर्तन 101–134

कीर्तन 129 · Kirtan 129

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

45 source linesपुस्तक पृष्ठ 321–323PDF 338–340

ओली मोली माय थुनु कह लाली तुतुराय।

(नथवारी रंगीली...)

ओली मोली माय थुनु कह लाली तुतुराय।

खेलति रहि गहवर लुका छिपी माय।

सँग रहीं ललितादिक सखि समुदाय।

इतने में तहँ आय इक बाबा माय।

भू पर पग धरि नहिं चलि सो आय।

औचक ऊपर ते नीचे आय।

छवि वाय रहि सुंदर मनहर माय।

वाके थी मूँछ न डाढ़ी माय।

इक कर थी मनहर वीणा माय।

इक कर करताल लिये था माय।

नारायण नारायण कह माय।

तनु ते निकसत प्रकाश रह माय।

देख्यो पुनि घूरि घूरि मोहिं माय।

इकटक लगि टकटकि वाय माय।

कबहुँक नाचत तनु सुधि बिसराय।

कबहुँक राधे राधे कहि गाय।

Source page 322

कबहुँक हो वा तनु कंपन माय।

कबहुँक वा दृग अँसुवन झरि लाय।

पुनि कह धनि धनि धनि कीरति माय।

धनि धनि धनि भानु भूप पितु याय।

धनि धनि बरसानो धाम याय।

धनि धनि धनि सखियन को समुदाय।

जो लली सँग खेलत बलि जाय।

पुनि का भयो आगे कुँवरि बताय।

पुनि सो किय मम परिकम्मा माय।

पुनि पुनि सो राधे राधे गाय।

सँग वीणा कर करताल बजाय।

इमि किये सात परिकम्मा माय।

पुनि सो लिय मोरि बलैया माय।

पुनि मोरी चरण धूरि लिय खाय।

पुनि पुनि नाचे पुनि पुनि सो गाय।

पुनि पूछी मैंने वाय माय।

बाबा टुक अपनो नाम बताय।

कित ते आयो सो गाम बताय।

तुम सब जानति सो इमि कह माय।

Source page 323

पुनि हँसत भज्यो सो ऊपर माय।

हम सब ललितादि लखत रहि वाय।

है सो कोउ पागल बाबा माय।

मैंने ठीक कहा है ना ओ माय।

चुप चुप लाली सो नारद आय।

वो तो हरि को अवतार कहाय।

वो भ्रमत रहत त्रिभुवन कह माय।

सुर नर मुनि सब पूजत नित वाय।

हैं ब्रह्म “कृपालु” कुँवरि तव माय॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २137
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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