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मेरी राधा रानी रस की खानी।
(नथवारी रंगीली...)
मेरी राधा रानी रस की खानी।
मेरी राधा रानी अवढर दानी।
वृंदावन की हैं महरानी।
ठाकुर हूँ की हैं ठकुरानी।
Source page 160
हैं प्रेम सुधा रस की खानी।
त्रिभुवन दानिहुँ की हैं दानी।
राधा तत्व वेद नहिं जानी।
नेति नेति कह श्रुति अनजानी।
श्यामहुँ ने निज स्वामिनि मानी।
श्यामहुँ कर जाकर अगवानी।
सिंहासन बैठीं ठकुरानी।
आरति कर तिन सारँग पानी।
तिन सुख चाहत सारँग पानी।
तिन पद रज चह सारँग पानी।
चरण पलोटत सारँग पानी।
भृकुटि तकत नित सारँग पानी।
जयति जयति कह सारँग पानी।
आरति करत भवानी वानी।
कोटिन कमला हैं नौकरानी।
ब्रह्मा अस्तुति कर महरानी।
शिव आये बनि रास शिवानी।
लाजति छवि लखि छवि ठकुरानी।
दीनबन्धु हैं राधारानी।
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पतित पावनी राधारानी।
अधमन अपनावति महरानी।
निर्बल की बल राधारानी।
अशरण शरण हैं राधारानी।
शरणागत रक्षक ठकुरानी।
जगत प्रकट कर राधारानी।
जग पालन कर राधारानी।
जगत प्रलय कर राधारानी।
वृन्दावन विहरति ठकुरानी।
गहवर वन विहरति महरानी।
वृन्दावन उनकी रजधानी।
दिव्य रास कर नित ठकुरानी।
ब्रजरस मिले कृपा महरानी।
येहि “कृपालु” रस तरसत ज्ञानी॥
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