मेरे चितघन आनन्दघन घनश्याम।
(नथवारी रंगीली...)
मेरे चितघन आनन्दघन घनश्याम।
सत चित आनन्द घन तन घनश्याम।
वारत शत काम लखत छवि श्याम।
चुये रोम रोम ब्रज रस तन घनश्याम।
वारत छवि लखि छवि तन घनश्याम।
करे नित्य रास वृन्दावन श्याम।
चलें पाछे पाछे ब्रज बनितनि घनश्याम।
बिके हाथ भक्त बिनु दाम श्याम।
दै छाछ नचावेँ सखिन श्याम।
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नाचत ब्रजबाल ताल घनश्याम।
घोड़ा बनि भाजत सखन श्याम।
गोपन मुख जूठन खायँ श्याम।
गोपिन सिर घट उठवायँ श्याम।
गोबर टोकरि उठवायँ श्याम।
गोखुर रज मण्डित तन घनश्याम।
शोभित तनु पंक लिप्त घनश्याम।
ह्वै पूर्णकाम किये रास श्याम।
बनि गये शिवानी शिव लखि श्याम।
मुर्छित छिति गिर्यो काम लखि श्याम।
श्यामा को स्वामिनि मान श्याम।
श्यामा को चापत चरण श्याम।
श्यामा की निरखत भौंह श्याम।
श्यामा की डगर बुहार श्याम।
श्यामा बिनु पलक कलप जनु श्याम।
श्यामा पद अँसुवन धोय श्याम।
श्यामा मानिनिहिं मनाव श्याम।
श्यामा हित धर तनु बाम श्याम।
श्यामा श्यामा रट नित्य श्याम।
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श्यामा हैं आत्मा देह श्याम।
श्यामा पग मुकुट धरत घनश्याम।
श्यामा ते कृपा माँग घनश्याम।
श्यामा की अगवानी कर श्याम।
श्यामा धर पग जहँ तहँ सिर श्याम।
श्यामा की जय बोलें घनश्याम।
श्यामा भोरी नटखट घनश्याम।
श्यामा हित बन मनिहार श्याम।
श्यामा हित बन लिलिहार श्याम।
श्यामा हित मालिनि बने श्याम।
श्यामा हित योगिनि बने श्याम।
श्यामा “कृपालु” ही बनी श्याम॥