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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 127 · 135/142

कीर्तन 101–134

कीर्तन 127 · Kirtan 127

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

39 source linesपुस्तक पृष्ठ 316–318PDF 333–335

जब ते मैं लखी सखि छवि वाय बलभाय।

(नथवारी रंगीली...)

जब ते मैं लखी सखि छवि वाय बलभाय।

हाय हाय मोरा पिया बिनु जिया घबराय।

मैं तो गइ पनघट सँग सखि समुदाय।

तहँ आयो घूमत झूमत बलभाय।

मैं तो घूँघट में थी नहिं देखा बलभाय।

वाने कही सुनो सुनो सुनो सखि समुदाय।

ब्रज में न कोउ पतिव्रता मोय लखाय।

यदि कोउ हो तो टुक मेरे सन्मुख आय।

यह सुनि मोय अतिशय क्रोध उर आय।

मैंने कही मैं हूँ मैं हूँ पतिव्रता बलभाय।

वाने कही ओरी गोरी जो तू पतिव्रता आय।

टुक घुँघटा उठाय दृग दृग ते मिलाय।

हौँ हूँ घुँघटा उठाय के गइ ढिंग बलभाय।

वाने ऐसी आँखि मारी गिरी भू पै कहि हाय।

जब मुर्छा गई तो देखा सोइ बलभाय।

सखि मधुर मधुर धुनि मुरलि बजाय।

Source page 317

सुनि मुरलि की धुनि तनु सुधि बिसराय।

तनु काँपे दृग आनँद जल बरसाय।

सो तो गयो कहुँ मोहिं लखि मृदु मुसकाय।

हौँ तो विकल भई न कल इक पल आय।

सखि बोली मैंने कहा था न लखु बलभाय।

तू न मानी किय मनमानी भल फल पाय।

यह रोग है असाध्य प्रेम रोग कहलाय।

तूने जानि जानि लिये रोग उर में लगाय।

सखि कह सुनु सखि जिया रहे चाहे जाय।

लागी छुटे नहिं लागी ऐसी बुरी है बलाय।

सखि होना था हुआ सो मेरी हाँसी न उड़ाय।

अब कछु याय रोग का उपाय तो बताय।

नभ जल थल दीखे मोय छवि बलभाय।

मन कह इक बार वाय सीने से लगाय।

अब कैसे जावूँ घर कासोँ कहा कहूँ जाय।

जान लेंगे लोग यह रोग छुपे न छुपाय।

सखि कह इक बात साँची मोको बताय।

यह वेदना है कितनी मधुर मनभाय।

सखि कह चुप चुप चुप बातें न बनाय।

Source page 318

सो का जाने पीर जाके पग फटी न बिवाय।

काउ दिन तू भी देखेगी जो छवि बलभाय।

है “कृपालु” की चुनौती रोये कहि हाय हाय॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २135
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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