कीर्तन 101–134
कीर्तन 127 · Kirtan 127
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
जब ते मैं लखी सखि छवि वाय बलभाय।
जब ते मैं लखी सखि छवि वाय बलभाय।
हाय हाय मोरा पिया बिनु जिया घबराय।
मैं तो गइ पनघट सँग सखि समुदाय।
मैं तो घूँघट में थी नहिं देखा बलभाय।
वाने कही सुनो सुनो सुनो सखि समुदाय।
ब्रज में न कोउ पतिव्रता मोय लखाय।
यदि कोउ हो तो टुक मेरे सन्मुख आय।
यह सुनि मोय अतिशय क्रोध उर आय।
मैंने कही मैं हूँ मैं हूँ पतिव्रता बलभाय।
वाने कही ओरी गोरी जो तू पतिव्रता आय।
टुक घुँघटा उठाय दृग दृग ते मिलाय।
हौँ हूँ घुँघटा उठाय के गइ ढिंग बलभाय।
वाने ऐसी आँखि मारी गिरी भू पै कहि हाय।
Source page 317
सुनि मुरलि की धुनि तनु सुधि बिसराय।
सो तो गयो कहुँ मोहिं लखि मृदु मुसकाय।
सखि बोली मैंने कहा था न लखु बलभाय।
तू न मानी किय मनमानी भल फल पाय।
यह रोग है असाध्य प्रेम रोग कहलाय।
तूने जानि जानि लिये रोग उर में लगाय।
सखि कह सुनु सखि जिया रहे चाहे जाय।
लागी छुटे नहिं लागी ऐसी बुरी है बलाय।
सखि होना था हुआ सो मेरी हाँसी न उड़ाय।
अब कछु याय रोग का उपाय तो बताय।
मन कह इक बार वाय सीने से लगाय।
अब कैसे जावूँ घर कासोँ कहा कहूँ जाय।
जान लेंगे लोग यह रोग छुपे न छुपाय।
Source page 318
सो का जाने पीर जाके पग फटी न बिवाय।
