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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 33 · 41/142

कीर्तन 1–50

कीर्तन 33 · Kirtan 33

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

41 source linesपुस्तक पृष्ठ 89–91PDF 106–108

भाय गयो भाय गयो बलभाय,

(हैं बाँको सुन्दर...)

भाय गयो भाय गयो बलभाय,

अब पति सुत कछु न सुहाय।

उर आनंद नाहिँ समाय,

हौं रंकिनि पारस पाय॥

वह मुकुट लटक बलभाय,

वह चितवनि मृदु मुसकाय।

Source page 90

गइ मम उर माहिं समाय,

हौं रंकिनि पारस पाय॥

वह नैन सैन बलभाय,

वह मृदु बोलनि मुसकाय।

मम रोम रोम रह छाय,

हौं रंकिनि पारस पाय॥

रस मुरली धुनि बलभाय,

तन मन सुधि दिय बिसराय।

तन सुख अब मन नहिं भाय,

हौं रंकिनि पारस पाय॥

कानन कुंडल हलकाय,

बेसर झलमल झलकाय।

छवि लखत बनत बलभाय,

हौं रंकिनि पारस पाय॥

गल भल वनमाल सुहाय,

गल गुंजमाल बलभाय।।

गल कौस्तुभ मणि छवि छाय,

हौं रंकिनि पारस पाय॥

Source page 91

कटि किंकिनि धुनि मनभाय,

कटि पीताम्बर छवि छाय।

कछनी कमनीय सुहाय,

हौं रंकिनि पारस पाय॥

कर मणि कंकण मनभाय,

भुज बाजूबंद सुहाय।

अँगुरिन मुँदरिन बलभाय,

हौं रंकिनि पारस पाय॥

अति मृदुल चरण बलभाय,

पद नख मणि दुति दमकाय।

लखि शंभु समाधि भुलाय,

हौं रंकिनि पारस पाय॥

गति मतवारी मनभाय,

लखि ज्ञानिहुँ ज्ञान भुलाय।

नख शिख चिन्मय तनु याय,

बलि बलि “कृपालु” बलभाय॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २041
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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