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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 114 · 122/142

कीर्तन 101–134

कीर्तन 114 · Kirtan 114

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

45 source linesपुस्तक पृष्ठ 285–287PDF 302–304

मैं तो बिकि गई बिनु ही दाम सखी।

(नथवारी रंगीली...)

मैं तो बिकि गई बिनु ही दाम सखी।

मोहिं लियो मोल घनश्याम सखी।

गइ रहि पनघट हौं बाम सखी।

तहँ मिली मोहिं इक बाम सखी।

वाने कही जनि लखियो श्याम सखी।

जो भी लखे वापे जादू डारे श्याम सखी।

मैंने कही मैं न ऐसी वैसी बाम सखी।

मेरो कहा करि लेगो सो श्याम सखी।

इतने में आयो झूमत श्याम सखी।

Source page 286

मैंने घुँघटा उठा के देखा श्याम सखी।

वो तो साँचु कोटि काम अभिराम सखी।

मैं तो लुटि गइ लखतहिं श्याम सखी।

पुनि मुरली बजाइ सोइ श्याम सखी।

गिरी मुर्छित छिति हौं बाम सखी।

जब मुर्छा गइ तो देखा श्याम सखी।

पुनि सुधि बुधि भूली लखि श्याम सखी।

वो तो मुसका के चला गया श्याम सखी।

मेरा सब कुछ ले गया श्याम सखी।

अब जित देखूँ तित दीखे श्याम सखी।

जग ते भइ मैं अब बेकाम सखी।

मेरे दृग माँगे सोइ छवि श्याम सखी।

कान माँगे पुनि धुनि बेनु श्याम सखी।

ज्यों ज्यों चाहूँ बिसराऊँ छवि श्याम सखी।

त्यों त्यों और और सुधि आवे श्याम सखी।

वो तो आग लगा के गया श्याम सखी।

वो तो जाने न बुझाना आग श्याम सखी।

मन तो लै गयो घनश्याम सखी।

मन बिनु कैसे करुँ गृह काम सखी।

Source page 287

नहिं भावे खान पान धन धाम सखी।

धरूँ कहूँ पाम परे कहूँ पाम सखी।

मैंने जानी नहिं ऐसी छवि श्याम सखी।

मैं थी छवि गर्वीली ब्रज बाम सखी।

मेरा गर्व चूर चूर किये श्याम सखी।

कहा जाय नहिं प्यार जार श्याम सखी।

सहा जाय न विरह दुख श्याम सखी।

जरुँ विरह अगिनि वसुयाम सखी।

बार बार कहूँ हाय पिय श्याम सखी।

लोग कहें भई बावरि बाम सखी।

रोके रुके नहिं आँसू बसुयाम सखी।

सुनु सुनु सुनु बोली इक बाम सखी।

प्रेम किये जा किये जा निष्काम सखी।

मन में न ला तू भुक्ति मुक्ति काम सखी।

येहि प्रेम के अधीन रहे श्याम सखी।

धन्य प्रेम “कृपालु” धन्य बाम सखी॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २122
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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