कीर्तन 101–134
कीर्तन 114 · Kirtan 114
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मैं तो बिकि गई बिनु ही दाम सखी।
मैं तो बिकि गई बिनु ही दाम सखी।
जो भी लखे वापे जादू डारे श्याम सखी।
मैंने कही मैं न ऐसी वैसी बाम सखी।
Source page 286
मैंने घुँघटा उठा के देखा श्याम सखी।
वो तो साँचु कोटि काम अभिराम सखी।
मैं तो लुटि गइ लखतहिं श्याम सखी।
पुनि मुरली बजाइ सोइ श्याम सखी।
गिरी मुर्छित छिति हौं बाम सखी।
जब मुर्छा गइ तो देखा श्याम सखी।
पुनि सुधि बुधि भूली लखि श्याम सखी।
वो तो मुसका के चला गया श्याम सखी।
अब जित देखूँ तित दीखे श्याम सखी।
मेरे दृग माँगे सोइ छवि श्याम सखी।
कान माँगे पुनि धुनि बेनु श्याम सखी।
ज्यों ज्यों चाहूँ बिसराऊँ छवि श्याम सखी।
त्यों त्यों और और सुधि आवे श्याम सखी।
वो तो आग लगा के गया श्याम सखी।
Source page 287
धरूँ कहूँ पाम परे कहूँ पाम सखी।
मैंने जानी नहिं ऐसी छवि श्याम सखी।
मैं थी छवि गर्वीली ब्रज बाम सखी।
मेरा गर्व चूर चूर किये श्याम सखी।
कहा जाय नहिं प्यार जार श्याम सखी।
बार बार कहूँ हाय पिय श्याम सखी।
रोके रुके नहिं आँसू बसुयाम सखी।
सुनु सुनु सुनु बोली इक बाम सखी।
प्रेम किये जा किये जा निष्काम सखी।
मन में न ला तू भुक्ति मुक्ति काम सखी।
