प्राणधन नँदनंदन घनश्याम।
(नीको लागे...)
प्राणधन नँदनंदन घनश्याम।
तुम ही हो मम आत्मा श्याम।
तुम ही हो मम अंशी श्याम।
तुम ही हो मम स्वामी श्याम।
तुम ही सखा हमारे श्याम।
तुम ही मेरे सुत हो श्याम।
तुम ही मेरे प्रियतम श्याम।
तुम ही मेरी गति हो श्याम।
तुम ही मेरी मति हो श्याम।
तुम ही मेरी रति हो श्याम।
तुम ही मेरी जननी श्याम।
तुम ही जनक हमारे श्याम।
तुम ही मेरे सब कुछ श्याम।
तोसों अगनित नाते श्याम।
मैं तो भूला तो कहँ श्याम।
तुम जनि भूलो मों कहँ श्याम।
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मैं तो हूँ माया वश श्याम।
याते हौं अज्ञानी श्याम।
मैं भूला अचरज नहिं श्याम।
श्रुति सर्वज्ञ तुमहिं कह श्याम।
तुम तो उर पुर ही रह श्याम।
पुनि कैसे भूले मोहिँ श्याम।
कान खोलि अब सुन लो श्याम।
चाहे प्यार करो मोहिँ श्याम।
चाहे ठुकराओ मोहिँ श्याम।
चाहे मोहिँ मारो तुम श्याम।
मेरे थे हो रहिहौं श्याम।
तुम्हरो कहा हुआ यह श्याम।
निर्बल का बल हूँ मैं श्याम।
नाथ अनाथन का मैं श्याम।
हौं बिनु हेतु सनेही श्याम।
बिनु कारण करुणाकर श्याम।
पतितन को पावन मैं श्याम।
मैं हूँ दीन बन्धु घनश्याम।
नाथ अकिंचन का मैं श्याम।
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अधम उधारन हूँ मैं श्याम।
बारेक जो कह मेरे श्याम।
तेहिं अपनो मानूँ मैं श्याम।
मैं हूँ परम हितैषी श्याम।
इन वचनों को सोचहुँ श्याम।
भटकत भटकत थकि गये पाम।
अब तो लखु हमरिहुँ ढिंग श्याम।
सात स्वर्ग हौं नहिं चह श्याम।
पाँच मुक्ति हौं नहिं चह श्याम।
सुख बैकुंठहुँ नहिं चह श्याम।
हौं चह तेरी सेवा श्याम।
हौं चह बस तेरा सुख श्याम।
दे दो प्रेम “कृपालुहुँ” श्याम॥