कीर्तन 101–134
कीर्तन 121 · Kirtan 121
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मोते लिपट न निपट यमुन तट हट।
लखु लखें सखा सखी घूर घूर नटखट।
मैं भी क्वांरी तू भी क्वांरो तानो मारे जग झट।
तेरे रोम रोम भरा कूट कूट के कपट।
मैं हूँ तेरी यह तूने ही कहा है नटखट।
माया मारे तेरी प्यारी को तू देखे नटखट।
प्यारी करे पाप लिखे वाय पिय नटखट।
तू है जग व्यापक तूने कहा नटखट।
काहे सामने न आये काहे डरे नटखट।
Source page 304
सिता मिले जल जल लागे मीठा नटखट।
तू है मुझमें न मिला तेरा सुख नटखट।
दिव्य छवि न दिखायो कियो प्यारी सों कपट।
सँग घूमें द्वार लख चौरासी नटखट।
प्यारी करे पाप दंड देय पिय नटखट।
यह कैसा तेरा न्याय बता दे नटखट।
मेरी शरण में आ जा कह मोते नटखट।
उत माया को लगा दे मेरे पाछे नटखट।
भजो माता पिता तूने श्रुति कह नटखट।
भज्यो तजि माता पिता बंदीगृह नटखट।
विधि को भी बनाया तूने बुद्धू नटखट।
Source page 305
किय ब्याह सोला हजार एक सौ आठ झट।
भये प्रति नारि दस दस सुत नटखट।
पुनि सबको लड़ा के मरवाया नटखट।
