कीर्तन 101–134
कीर्तन 120 · Kirtan 120
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मोरा चोरा चित काहे चोरी चोरी चितचोर।
मोरा चोरा चित काहे चोरी चोरी चितचोर।
मैं तो हती सीधी साधी भोरी भारी चितचोर।
Source page 301
मैं तो बिकि गइ बिनुहिं दाम चितचोर।
मैं तो लुटि गइ धुनि सुनतहिं चितचोर।
मैंने तेरा क्या बिगारा था लुटेरा चितचोर।
घर की रही न घाट की मैं अब चितचोर।
मन बिनु तो भवन लागे वन चितचोर।
नहिं भाये अब सुत पितु पति चितचोर।
दृग कह दिखला दे मोहिं मेरा चितचोर।
श्रुति कह पुनि मुरलि सुना दे चितचोर।
नासिका दिव्य तनु गंध माँगे चितचोर।
कासोँ कहूँ कैसे कहूँ कहाँ जावूँ चितचोर।
न तो मरूँ न तो जिवूँ ऐसी दशा चितचोर।
हिय उठति हूक पुनि पुनि चितचोर।
लोग कहें मोहिं बावरी भई चितचोर।
मैं तो अच्छी भली खाती पीती हती चितचोर।
मैं तो हँसती हँसाती रहती थी चितचोर।
Source page 302
पति को बताऊँ कैसे जार प्रेम चितचोर।
सास बड़ी तेज मारे बेलन चितचोर।
अब तो जो था होना सो हुआ चितचोर।
इक बार और मुरलि सुना दे चितचोर।
लागी छूटे नहिं चाहे जिया जाय चितचोर।
याते चोट का न डर मोहिं अब चितचोर।
सुना तोरा चितचोरा प्यारी जू ने चितचोर।
याते खीझि तू भी सब चित चोरे चितचोर।
लोक में भी है कहावत यह चितचोर।
धोबी से न जीते गधे को ही मारे चितचोर।
ऐसे तू भी हारा प्यारी जू ते पिय चितचोर।
याते सब गोपिन चित चोरे चितचोर।
ले जा ले जा और जो भी चाहे ले जा चितचोर।
तन मन तो गया ही प्राण ले जा चितचोर।
मुरलि ने किया हाल जब ऐसा चितचोर।
