कीर्तन 1–50
कीर्तन 23 · Kirtan 23
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
तू भी मेरा यह माना मैंने बार बार।
Source page 62
तुझसे भी किया प्यार जग से भी किया प्यार।
तू तो कह “भी” से नहिं मोय “ही” से ही है प्यार।
तेरा भाव यह इक मुझसे ही करु प्यार।
जग तो है माता पिता भ्राता सुत भरतार।
कोउ नहिं कह करु इक मुझसे ही प्यार।
माता पिता कह करु सुत पति से भी प्यार।
जग में तो सुत पितु नहिं बने भरतार।
ऐसा कहुँ हो तो वाय सब कह दुराचार।
तू भी दण्ड दे के भेजे वाय नरक मझार।
तू तो कह मैं ही स्वामी सखा सुत भरतार।
तू ही माता तू ही पिता कह तेरी श्रुति चार।
हम कैसे मानें पितु सुत कहँ भरतार।
तू तो सब में ही रह कह वेद पुकार।
पुनि उन ते ही प्यार क्यों न माने निज प्यार।
तू तो कह जग वालों का है प्यार अन्य प्यार।
तेरे सिवा और कछु नहिं कह श्रुति चार।
Source page 63
पुनि माता पिता आदि प्यार कैसे अन्य प्यार।
तू तो जड़ में भी चेतन में भी रह यार।
पुनि कैसे कह जग प्यार है मिथ्या प्यार।
हरि कह सुनु तत्व ज्ञान सुनि उर धार।
मूर्ति भक्त नहिं पावे कबहूँ मम प्यार।
मूर्ति मधि मोय मानि मोते ही जो करे प्यार।
बस सोइ पावे निज भाव फल मम प्यार।
प्रेमियों के प्यार के हैं बस चार प्रकार।
एक वे हैं जो मोहिं ब्रह्म मानि करें प्यार।
एक वे जो बिनु जाने करें मो ही ते प्यार।
वे तो माने मोय स्वामी सखा सुत भरतार।
एक वे जो जग व्याप्त मोते ही करें प्यार।
जैसे मूर्ति में मोय मानि करि मोय प्यार।
उपर्युक्त तीनों को ही मिले मम प्यार।
एक वे जो जग को ही जग मानि करें प्यार।
वे न मोते करें प्यार करें माया ते ही प्यार।
याते फल पावें मायिक दुख संसार।
Source page 64
या तो हरि से ही करु जग भाव से ही प्यार।
हरि सत्य वस्तु याते फल पावे सत्य प्यार।
सारा जग तो है नश्वर माया का विकार।
याते जग प्यार फल नश्वर उर धार।
