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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 23 · 31/142

कीर्तन 1–50

कीर्तन 23 · Kirtan 23

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

47 source linesपुस्तक पृष्ठ 61–64PDF 78–81

तू भी मेरा यह माना मैंने बार बार।

(नथवारी रंगीली...)

तू भी मेरा यह माना मैंने बार बार।

तू ही मेरा यह माना नहिं एक बार।

Source page 62

तुझसे भी किया प्यार जग से भी किया प्यार।

तू तो कह “भी” से नहिं मोय “ही” से ही है प्यार।

तेरा भाव यह इक मुझसे ही करु प्यार।

जग तो है माता पिता भ्राता सुत भरतार।

कोउ नहिं कह करु इक मुझसे ही प्यार।

माता पिता कह करु सुत पति से भी प्यार।

जग में तो सुत पितु नहिं बने भरतार।

ऐसा कहुँ हो तो वाय सब कह दुराचार।

तू भी दण्ड दे के भेजे वाय नरक मझार।

तू तो कह मैं ही स्वामी सखा सुत भरतार।

तू ही माता तू ही पिता कह तेरी श्रुति चार।

हम कैसे मानें पितु सुत कहँ भरतार।

पुनि एक बात और सुनु नंदकुमार।

तू तो सब में ही रह कह वेद पुकार।

पुनि उन ते ही प्यार क्यों न माने निज प्यार।

तू तो कह जग वालों का है प्यार अन्य प्यार।

तेरे सिवा और कछु नहिं कह श्रुति चार।

लोग मूर्ति पूजा करें पावें तोहिं रिझवार।

मूर्ति से ही तू प्रकट हो के मिले रिझवार।

Source page 63

पुनि माता पिता आदि प्यार कैसे अन्य प्यार।

तू तो जड़ में भी चेतन में भी रह यार।

पुनि कैसे कह जग प्यार है मिथ्या प्यार।

हरि कह सुनु तत्व ज्ञान सुनि उर धार।

मूर्ति भक्त नहिं पावे कबहूँ मम प्यार।

मूर्ति मधि मोय मानि मोते ही जो करे प्यार।

बस सोइ पावे निज भाव फल मम प्यार।

प्रेमियों के प्यार के हैं बस चार प्रकार।

एक वे हैं जो मोहिं ब्रह्म मानि करें प्यार।

एक वे जो बिनु जाने करें मो ही ते प्यार।

वे तो माने मोय स्वामी सखा सुत भरतार।

एक वे जो जग व्याप्त मोते ही करें प्यार।

जैसे मूर्ति में मोय मानि करि मोय प्यार।

उपर्युक्त तीनों को ही मिले मम प्यार।

एक वे जो जग को ही जग मानि करें प्यार।

वे न मोते करें प्यार करें माया ते ही प्यार।

याते फल पावें मायिक दुख संसार।

भाव यह अग जग में जो हरि भाव धार।

पावे हरि का ही फल करें हरि सों ही प्यार।

Source page 64

या तो हरि से ही करु जग भाव से ही प्यार।

हरि सत्य वस्तु याते फल पावे सत्य प्यार।

सारा जग तो है नश्वर माया का विकार।

याते जग प्यार फल नश्वर उर धार।

हरि अरु हरिजन सों ही करु नित प्यार।

सोइ है अनन्य भक्त तू “कृपालु” उर धार॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २031
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Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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