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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 12 · 20/142

कीर्तन 1–50

कीर्तन 12 · Kirtan 12

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

49 source linesपुस्तक पृष्ठ 32–35PDF 49–52

भक्ति कल्प तरु सम श्रुति गाय।

(नीको लागे...)

भक्ति कल्प तरु सम श्रुति गाय।

भक्ति सबहिं सब फल दिलवाय।

जो चह जग सुख भक्ति दिलाय।

सात स्वर्ग सुख भक्ति दिलाय।

सिद्धि आठहूँ भक्ति दिलाय।

ऐन्द्र ब्राह्म पद भक्ति दिलाय।

पाँच मुक्तिहूँ भक्ति दिलाय।

जो नर दुर्लभ भक्ति दिलाय।

Source page 33

जो अलभ्य सो भक्ति दिलाय।

मनहुँ अगोचर भक्ति दिलाय।

पंचक्लेशहूँ भक्ति नसाय।

पंचकोशहूँ भक्ति जराय।

पंच प्रपंचहुँ भक्ति मिटाय।

तीनिहुँ कर्मन भक्ति नसाय।

तीनि देह ते भक्ति छुड़ाय।

राग द्वेष को भक्ति मिटाय।

विद्या माया भक्ति भगाय।

प्रबल अविद्या भक्ति नसाय।

कर्म धर्म फल भक्ति दिलाय।

ज्ञान योग फल भक्ति दिलाय।

जपिन तपिन फल भक्ति दिलाय।

भक्ति पुत्र ही ज्ञान कहाय।

भक्ति पुत्र वैराग्य बताय।

बिनु माँ के सुत ह्वै न सकाय।

भक्ति अधीन ब्रह्म बलभाय।

डोरी सम हरि भक्ति कहाय।

सरिस पतंग ब्रह्म बलभाय।

Source page 34

भक्ति नटी मर्कट बलभाय।

भक्ति न देन चहत बलभाय।

भुक्ति मुक्ति दे द्रुत बलभाय।

ह्लादिनि सार भक्ति कहलाय।

भक्तिहिं कोटि अनेक बताय।

प्रेम स्नेह अरु मान कहाय।

प्रणय राग अनुराग कहाय।

एक कोटि कहँ भाव बताय।

अंतिम महाभाव कहलाय।

महाभाव रस गोपिन पाय।

महाभाव पायेहु बलभाय।

भक्ति मुकुट मणि मादन आय।

मादन रति राधा ही पाय।

भक्ति तत्व परतत्व कहाय।

तेहि बिनु धर्म अधर्म कहाय।

ब्रह्म ज्ञान अज्ञान कहाय।

अष्ट योगहूँ रोग कहाय।

सब साधन फल भक्ति बताय।

बिनु हरि भक्ति न माया जाय।

Source page 35

बिनु हरि भक्ति न कोउ सुख पाय।

करहु “कृपालु” भक्ति बलभाय॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २020
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Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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