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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 104 · 112/142

कीर्तन 101–134

कीर्तन 104 · Kirtan 104

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

39 source linesपुस्तक पृष्ठ 261–263PDF 278–280

तोसों नहिं बोलूँ जारे जारे हरजाई।

(नथवारी रंगीली...)

तोसों नहिं बोलूँ जारे जारे हरजाई।

मैंने प्रीति लगाई तो सों भल भरि पाई।

मैंने प्रथम न जानी तोहिं याते ठगाई।

मैं तो थी भोरी भारी तोरी बातों में आई।

तूने तो मोते मीठी मीठी बात बनाई।

मधुकर फूल रस ले के ज्यों तजि जाई।

ऐसेहि तोहिं भी नई नई मन भाई।

कारो तन कारो मन तोरा हरजाई।

कारे तन वारे सबरे ही दुखदाई।

बामन ने भी कारो कारो तन पाई।

सो बलि को छलि पाताल पठाई।

रामहुँ ने कारो कारो तन पाई।

छुपि बालि बध्यो नहिं लाज आई।

कागहु ने कारो कारो तन पाई।

निज सुत कह पिक ते पलवाई।

तूने अधर सुधा रस प्रथम पिलाई।

Source page 262

झूठी मूठी मीठी बतियन मोहिं भुराई।

तोसों उऋण न हौं ह्वै कबहुँ सकाई।

अब तजि तृण सम गये मोहिं भुलाई।

तोरी रमा भोरी जो तोरी बातों में आई।

मधुपुरी वारी आज हैं जो मनभाई।

कालि उनहुँन तजि पुनि और कहुँ जाई।

जो हुआ सो हुआ अब आवूँ न ठगाई।

अब नहिं तोरी दाल गले हरजाई।

अब लौं तो सही अब सहि नहिं जाई।

तेरे मन में तो रह नित कपट खटाई।

तूने अब लौं तो बस ढोर चराई।

तू का जाने निष्ठुर उर पीर पराई।

तोको तो बस कुबरी नारि मन भाई।

ब्रज में तो नहिं कोउ कुबरी लुगाई।

जाने कैसा जादू किया मो पे तूने हरजाई।

तेरा अवगुन भी मोहिं अति मनभाई।

हम साँप छछूँदरि गति पाई।

नहिं मरत न जियत दुसह दुख पाई।

मन तो अपना है प्रीति पराई।

Source page 263

नहिं जरत न बुझत आग अस लाई।

सुलगत रह यह विरहाग सदाई।

कह तबहुँ “कृपालु” सोइ मनभाई॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २112
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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