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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 5 · 13/142

कीर्तन 1–50

कीर्तन 5 · Kirtan 5

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

59 source linesपुस्तक पृष्ठ 12–15PDF 29–32

एक बार ज्ञानी ऊधो पूछे बलभाय।

(नीको लागे...)

एक बार ज्ञानी ऊधो पूछे बलभाय।

श्रेय के अनेक पथ बुध क्यों बताय॥

इतने बने क्यों पथ मोहिँ समुझाय।

इनमें हैं सत्य कौन और क्यों बताय॥

तुमने तो एक भक्ति योग ही बताय।

सोइ निरपेक्ष सर्वश्रेष्ठ पथ आय॥

तुम वेेदकृत वेदवित बलभाय।

तुम को ही सर्ववित श्रुति बतलाय॥

यह प्रश्न मेरा ही नहीं है बलभाय।

बड़े बड़े ज्ञानी जन रहे भरमाय॥

मेरे प्राण सखा ऊधो सुनु मन लाय।

इतने बने क्यों पथ अभी समुझाय॥

प्रलय में मेरी वेद वाणी भी नसाय।

सृष्टि में प्रथम वेद विधि को बताय॥

वेद में तो मैंने एक धर्म बताय।

सोइ धर्म भागवत धर्म कहाय॥

Source page 13

ब्रह्मा ने तो वेद ज्ञान मनु को कराय।

ऐसे ही परंपरा से वेद चलि आय॥

वेद पाठियों का तो स्वभाव भिन्न आय।

वासना भी उन मन भिन्न भिन्न आय॥

सत्व रज तम गुण माया के बताय।

याते वासना के तीन गुण युत भाय॥

वेद पाठियों की चित्तवृत्ति भिन्न आय।

याते वेद वाणी अर्थ नाना प्रकटाय॥

मेरी वेद वाणी तो अलौकिक आय।

वामें जो भी जैसा चाहे अर्थ मिलि जाय॥

कुछ पथ वेद निंदकों ने भी चलाय।

कुछ पथ दंभी जनों ने भी चलवाय॥

मायावश सब की ही मति भरमाय।

याते निज रुचि का ही पथ बतलाय॥

कोउ पथ धर्म कोउ यश को बताय।

कोउ पथ काम कोउ सत्य को बताय॥

कोउ श्रेय पथ शम दम को बताय।

कोउ ऐश्वर्य कोउ भोग को बताय॥

कोउ त्याग कोउ यज्ञ तप बतलाय।

Source page 14

कोउ व्रत कोउ यम नियम बताय॥

ऊधो जो बताये सब कर्म कहलाय।

कर्म फल तो सदा अनित्य बतलाय॥

कछु काल अल्प स्वर्ग लोक सुख पाय।

पुण्य क्षीण होय जब पुनि दुख पाय॥

स्वर्ग सुख भोगि पुनि मर्त्य लोक आय।

स्वर्ग कामी को प्रमूढ़ वेद बतलाय॥

सत्य दया युक्त धर्म श्रेष्ठ कहलाय।

सोऊ मन को न पूर्ण शुद्ध कराय॥

तप युक्त ज्ञान भी प्रवर कहलाय।

सोऊ मन को न पूर्ण शुद्ध करवाय॥

याते साध्य एकमात्र भक्ति कहाय।

भक्ति निष्काम सर्वश्रेष्ठ बताय॥

भक्त भुक्ति मुक्ति को तो डाकिनी बताय।

शुद्ध भक्त चह सेव्य सुख ही सदाय॥

मोहिँ वैसे प्रिय नहिं विधि शिव आय।

जैसे निष्काम भक्त प्रिय मोहिं आय॥

वैसे प्रिय रमा राम आत्मा न आय।

जैसे निष्काम भक्त प्रिय मोहिँ आय॥

Source page 15

ऐसे भक्त पाछे पाछे चलूँ मैं सदाय।

पद रज उड़ि परे मेरे तनु आय॥

याते तुम ऊधो करो भक्ति ही सदाय।

यह ही “कृपालु” शास्त्र वेद सार आय॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २013
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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