कीर्तन 1–50
कीर्तन 5 · Kirtan 5
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
एक बार ज्ञानी ऊधो पूछे बलभाय।
श्रेय के अनेक पथ बुध क्यों बताय॥
इतने बने क्यों पथ मोहिँ समुझाय।
इनमें हैं सत्य कौन और क्यों बताय॥
तुमने तो एक भक्ति योग ही बताय।
सोइ निरपेक्ष सर्वश्रेष्ठ पथ आय॥
तुम को ही सर्ववित श्रुति बतलाय॥
यह प्रश्न मेरा ही नहीं है बलभाय।
बड़े बड़े ज्ञानी जन रहे भरमाय॥
मेरे प्राण सखा ऊधो सुनु मन लाय।
प्रलय में मेरी वेद वाणी भी नसाय।
सृष्टि में प्रथम वेद विधि को बताय॥
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ब्रह्मा ने तो वेद ज्ञान मनु को कराय।
वेद पाठियों का तो स्वभाव भिन्न आय।
वासना भी उन मन भिन्न भिन्न आय॥
याते वासना के तीन गुण युत भाय॥
वेद पाठियों की चित्तवृत्ति भिन्न आय।
याते वेद वाणी अर्थ नाना प्रकटाय॥
वामें जो भी जैसा चाहे अर्थ मिलि जाय॥
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कछु काल अल्प स्वर्ग लोक सुख पाय।
पुण्य क्षीण होय जब पुनि दुख पाय॥
स्वर्ग सुख भोगि पुनि मर्त्य लोक आय।
स्वर्ग कामी को प्रमूढ़ वेद बतलाय॥
सत्य दया युक्त धर्म श्रेष्ठ कहलाय।
तप युक्त ज्ञान भी प्रवर कहलाय।
सोऊ मन को न पूर्ण शुद्ध करवाय॥
याते साध्य एकमात्र भक्ति कहाय।
भक्ति निष्काम सर्वश्रेष्ठ बताय॥
भक्त भुक्ति मुक्ति को तो डाकिनी बताय।
शुद्ध भक्त चह सेव्य सुख ही सदाय॥
मोहिँ वैसे प्रिय नहिं विधि शिव आय।
जैसे निष्काम भक्त प्रिय मोहिं आय॥
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ऐसे भक्त पाछे पाछे चलूँ मैं सदाय।
