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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 13 · 21/142

कीर्तन 1–50

कीर्तन 13 · Kirtan 13

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

56 source linesपुस्तक पृष्ठ 35–38PDF 52–55

रूप रसो वै सः बलभाय।

(नीको लागे...)

रूप रसो वै सः बलभाय।

भाव रूप रस कृष्ण कहाय।

रस भूमा अनंत श्रुति गाय।

रस नित नव नव होत सदाय।

रस नित क्षण क्षण बाढ़त जाय।

रस जो पाय सनातन पाय।

इक रस ब्रह्मानंद कहाय।

यह रस निराकार बलभाय।

यह रस प्रेम हीन कहलाय।

यह रस द्वैत रहित बलभाय।

यह रस बस कैवल्य दिलाय।

इक रस बैकुण्ठहुँ को आय।

Source page 36

यह रस नारायण को आय।

यामें रूप चतुर्भुज भाय।

लीला परिकर रहित बताय।

शांत भाव युत भक्तन पाय।

निराकार ते सरस बताय।

यामें नाम रूप गुण भाय।

एक रस द्वारवती को आय।

यह रस द्विभुज कृष्ण को आय।

यह रस वैधी भक्तन पाय।

बैकुंठहुँ ते सरस बताय।

यामें लीला परिकर भाय।

इक मथुरा को रस बतलाय।

यह रस देवकि सुत को आय।

यामें लीला परिकर आय।

द्वारवती ते श्रेष्ठ बताय।

इक रस वृंदावन को आय।

यामें नहिं ऐश्वर्य बताय।

एकहिं रस माधुर्य बताय।

यह रस सर्वश्रेष्ठ कहलाय।

Source page 37

यह रस ब्रज रस रसिक बताय।

चार भाव या रस में आय।

एक भाव तो दास्य कहाय।

वाते श्रेष्ठ सख्य कहलाय।

वाते वर वात्सल्य बताय।

सर्वश्रेष्ठ माधुर्य बताय।

तीन भेद माधुर्य बताय।

इक माधुर्य सकाम बताय।

उदाहरण कुब्जादि बताय।

यह रति साधारणी कहाय।

इक माधुर्य मिश्र बतलाय।

निज सुख पिय सुख मिश्र बताय।

समंजसा रति यह कहलाय।

उदाहरण महिषी समुदाय।

इक माधुर्य अकाम बताय।

याय समर्था रति बतलाय।

यह रति पिय सुख हित ही भाय।

याको गोपी प्रेम बताय।

सर्वश्रेष्ठ यह प्रेम कहाय।

Source page 38

सर्वोपरि रस रास बताय।

गोपी प्रेम युक्त नर पाय।

सब ते दुर्लभ रास बताय।

यह रस कमलाहूँ नहिं पाय।

रसिक “कृपालु” कृपा ते पाय॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २021
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Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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