मेरे गुरुवर भक्ति रस अवतार।
(नीको लागे मोको... )
मेरे गुरुवर भक्ति रस अवतार।
गुरु कह गुरु हरि दोउ इक सार।
गुरु कह गुरु का अधिक आभार।
गुरु कह सेव्य तत्व नंदकुमार।
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गुरु कह प्राप्ति साधन भक्ति सार।
गुरु कह साधन भक्ति नौ प्रकार।
गुरु कह नौ में स्मरण भक्ति सार।
गुरु कह भाव के भी चार प्रकार।
गुरु कह भाव में माधुर्य भाव सार।
गुरु कह यह संसार असार।
गुरु कह तनु हित सब संसार।
गुरु कह जीव हित नंदकुमार।
गुरु कह धर्म आदि कैतव चार।
गुरु कह मोक्ष कैतव सरदार।
गुरु कह कामना है पाँच प्रकार।
गुरु कह पाँच कामना मन धार।
गुरु कह जीव अंश नंदकुमार।
गुरु कह जीव विषय नंदकुमार।
गुरु कह सतघन नंदकुमार।
गुरु कह चितघन नंदकुमार।
गुरु कह सुखघन नंदकुमार।
गुरु कह सब उर नंदकुमार।
गुरु कह सर्वत्र नंदकुमार।
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गुरु कह हरि से ही करु नित प्यार।
गुरु कह मन शुद्ध करे हरि प्यार।
गुरु कह शुद्ध मन पावे दिव्य प्यार।
गुरु कह दिव्य प्रेम ह्लादिनी सार।
गुरु कह दिव्य मन दिव्य प्रेम धार।
गुरु कह तन करे जग व्यवहार।
गुरु कह मन करे हरि सों ही प्यार।
गुरु कह माँगो रो के निष्काम प्यार।
गुरु कह गुरु ही देय दिव्य प्यार।
गुरु कह कृष्ण तत्ववित गुरु धार।
गुरु कह वेद शास्त्रवित गुरु धार।
गुरु कह दिव्य प्रेम प्राप्त गुरु धार।
गुरु कह हरि गुरु को ही उर धार।
गुरु कह गुरु करुणा भंडार।
गुरु कह गुरु दीनन रखवार।
गुरु कह गुरु पतितन पतवार।
गुरु कह गुरु निराधार आधार।
गुरु कह गुरु दिव्य गुण साकार।
गुरु कह गुरु दे अहैतुक प्यार।
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गुरु कह गुरु पै दे सर्वस वार।
गुरु कह “गु” का अर्थ है अंधकार।
गुरु कह “रु” का अर्थ मेटनहार।
गुरु कह जग प्रेम काम अन्धकार।
गुरु कह हरि प्रेम रवि अनुहार।
गुरु कह हरि सुख निष्काम प्यार।
गुरु कह निज सुख है सकाम प्यार।
गुरु कह हरि गुरु सेवा सार।
गुरु कह गुरु ही “कृपालु” कर्णधार॥